मंदिर ले जाने के साथ-साथ बच्चों को धर्म और संस्कृति का ज्ञान कराएं : संजय उपाध्याय।

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मुंबई वार्ता/शिव पूजन पांडेय

आपके लिए अपने बच्चों को मंदिर ले जाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि उन्हें अपने धर्म और अपनी संस्कृति की जानकारी कराएं । यही कार्य श्री जैन धार्मिक शिक्षण संघ अब तक करता आया है। शिक्षा के साथ धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी होना आज के युग की आवश्यकता है, ऐसे विचार भाजपा के विधायक संजय उपाध्याय ने रविवार को मुंबई में व्यक्त किए।

श्री धार्मिक शिक्षण संघ की ओर से वर्ष 2025 में कक्षा 1 से 36 तक के विद्यार्थियों के लिए आयोजित धार्मिक परीक्षा के परिणाम घोषित किए गए। इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए 109 विद्यार्थियों का श्री धार्मिक शिक्षण संघ की ओर से शानदार तरीके से सम्मान किया गया।

इस समारोह में वे प्रमुख अतिथि के रूप में बोल रहे थे। श्री जैन धार्मिक शिक्षण संघ के उपाध्यक्ष संजयभाई जीवनलाल शाह ने इस अवसर पर कहा कि यदि 5 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को विदेशी भाषा, संस्कृत भाषा, हिंदी और मराठी भाषा के साथ-साथ धार्मिक शिक्षा नई तकनीक के माध्यम से दी जाए, तो उनके सर्वांगीण विकास को अवश्य ही प्रेरणा मिलेगी। संस्कृत भाषा, विदेशी भाषा और अंग्रेजी भाषा के साथ धार्मिक शिक्षा की नई तकनीक के माध्यम से 50,000 से अधिक बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने का हमारा उद्देश्य है।

धार्मिक शिक्षा की इस नई तकनीक से भारत ही नहीं, बल्कि उन देशों में भी लाभ पहुंचेगा जहाँ जैन बच्चे रहते हैं। बच्चों में संस्कारों की शुरुआत का पहला चरण होता है पाठशाला। जैन शासन का प्राण ही है पाठशाला। इन पाठशालाओं से जो विद्यार्थी निकलते हैं, वे भविष्य में जैन शासन के साधु-साध्वी, सुश्रावक-सुश्राविका, ट्रस्टी, स्वयंसेवक और रक्षक बनते हैं। वर्तमान समय में बच्चों को धार्मिक शिक्षा देना संस्था की प्राथमिकता है। यदि बच्चों में धार्मिक संस्कार होंगे, तो उनका निश्चित रूप से विकास होगा, इसके लिए संस्था सतत प्रयासरत है।

जैन धर्म के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य ये बच्चे बड़े होकर करेंगे। यह पाठशाला जैन धार्मिक शिक्षा के प्रचार और समाजसेवा में संस्था के बढ़ते योगदान का प्रतीक है। श्री जैन धार्मिक शिक्षण संघ के ट्रस्टी अशोक नरसिंह चरला ने बताया कि मुंबई की 450 से अधिक स्कूलों में 1300 से अधिक शिक्षक योगदान दे रहे हैं। आज मुंबई की स्कूलों में 50,000 से अधिक बच्चे धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

श्री जैन धार्मिक शिक्षण संघ के महिला विभाग की उपाध्यक्ष अल्पाबेन संजयभाई शाह ने बताया कि जैन धर्म विश्व का एक प्राचीन और वैज्ञानिक धर्म है, जो जीवदया, अहिंसा और आत्मशुद्धि पर आधारित है। पाठशाला इस धर्म के मूल स्वरूप और सिद्धांतों को बच्चों में अंकुरित करने का पवित्र कार्य करती है। पाठशालाओं के माध्यम से बच्चों को धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, नैतिक मूल्य और सामाजिक उत्तरदायित्व की भी शिक्षा दी जाती है। यह आनेवाली पीढ़ी को धर्म और संस्कृति से जोड़े रखने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम है, जो उन्हें विनय, विवेक और जीवदया जैसे गुण सिखाकर आत्मा के महत्व की भावना से जोड़ता है।

इस अवसर पर गच्छाधिपती परम पूज्य आचार्य भगवंत श्री राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज, परमपूज्य आचार्य भगवंत श्री मुक्ति वल्लभ सुरीश्वरजी महाराज, परमपूज्य आचार्य भगवंत श्री धर्म यश सुरीश्वरजी महाराज, जवाहरलाल मोतीलाल शाह, सुरेशभाई देवचंद संघवी, संजयभाई शाह, अशोक नरसिंह चरला, उषाबेन हेमेन्द्र दोशी, अल्पाबेन संजयभाई शाह, विमलेशभाई और किरीटभाई फोपाणी ने भी अपने प्रेरणादायी विचार व्यक्त किए।

इस समारोह में अनेक गणमान्य अतिथियों और विभिन्न संस्थाओं के ट्रस्टीज का श्री धार्मिक शिक्षण संघ की ओर से सम्मान किया गया।

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