● ड्राइवरों की मांग — “हमें पार्टनर नहीं, कर्मचारी बनाया जाए” .
भिवंडी /मुंबई वार्ता संवाददाता

ओला और उबर टैक्सी सेवा से जुड़े सैकड़ों ड्राइवरों ने शुक्रवार से भिवंडी में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। ड्राइवरों का आरोप है कि कंपनियों की मनमानी और लगातार बढ़ती आर्थिक समस्याओं के चलते अब गुज़ारा करना मुश्किल हो गया है। हड़ताल पर उतरे ड्राइवरों का कहना है कि जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जातीं, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा।


भिवंडी के खंडू पाड़ा क्षेत्र में बड़ी संख्या में ड्राइवरों ने अपनी गाड़ियां सड़क किनारे लाइन में लगाकर विरोध दर्ज कराया। “बंद करो, बंद करो ओला-उबर बंद करो” जैसे नारों के साथ ड्राइवरों ने कंपनियों के खिलाफ आक्रोश जताया।
हड़ताल का नेतृत्व कर रहे ड्राइवर असलम शेख ने बताया कि ओला और उबर कंपनियां उन्हें “पार्टनर” बताकर जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती हैं, जबकि देश-विदेश में इन्हीं कंपनियों ने अपने ड्राइवरों को “कर्मचारी” का दर्जा देकर उन्हें सभी सुविधाएं और मुआवज़ा देना शुरू कर दिया है।
उन्होंने कहा, “जब हम पार्टनर हैं तो हमें मुनाफा क्यों नहीं मिलता? हमें सिर्फ घाटा और भूख ही क्यों नसीब होती है?”ड्राइवरों का कहना है कि कंपनियों द्वारा 2018 से यह आश्वासन दिया जा रहा है कि किराए में बढ़ोतरी की जाएगी, लेकिन अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। ऊपर से हर साल सरकार को टैक्स के रूप में करीब 50 हजार रुपये देना पड़ता है, जबकि कमाई दिन-ब-दिन घटती जा रही है।ड्राइवरों ने आरोप लगाया कि जब कंपनी कॉल करती है तो शुरुआत में ज्यादा मुनाफे का लालच दिया जाता है, जिससे सीधे-साधे ड्राइवर झांसे में आ जाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि 80% ड्राइवर अब घाटे में चल रहे हैं। कई ड्राइवर कर्ज लेकर गाड़ियां चलाना शुरू करते हैं, इस उम्मीद में कि भविष्य में धंधा अच्छा होगा, लेकिन बीते 8-9 वर्षों में हालात बद से बदतर होते गए हैं।
ड्राइवरों का यह भी कहना है कि लॉकडाउन के दौरान कंपनियों ने किसी भी ड्राइवर की कोई मदद नहीं की। जबकि विदेशों में कंपनियों को अपने ड्राइवरों को राहत ना देने पर भारी भरकम जुर्माना भुगतना पड़ा। असलम शेख ने बताया कि अमेरिका में उबेर को 600 डॉलर और इसी वर्ष में 300 डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा, क्योंकि वहां के ड्राइवर “कर्मचारी” की श्रेणी में आते हैं और कंपनियां उन्हें कम से कम न्यूनतम कमाई की गारंटी देती हैं।ड्राइवरों की मांग है कि उन्हें कर्मचारी का दर्जा दिया जाए, काम की निश्चितता और न्यूनतम आमदनी की गारंटी मिले।
उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर कंपनी और सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक यह हड़ताल जारी रहेगी। अब देखना यह है कि क्या सरकार और संबंधित कंपनियां इन टैक्सी चालकों की आवाज़ सुनती हैं या यह संघर्ष और लंबा खिंचता है।


