डाॅ धीरज फूलमती सिंह/ स्तंभकार/ मुंबई वार्ता

पिछले कुछ सालों में प्रीमियम और लग्जरी घरों की सप्लाई तो तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन मिडिल क्लास लोगों के लिए किफायती घरों की कमी आई है, जिसका खामियाजा मिडिल क्लास लोगों को झेलना पड़ रहा है.भारत का हाउसिंग मार्केट इस समय ऐसे दौर से गुजर रहा है, जो भविष्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर गहरा असर डाल सकता है। 2025 के पहले छह महीनों की तस्वीर देखें तो एक ओर प्रीमियम और लग्जरी हाउसिंग सेगमेंट में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं दूसरी ओर अफोर्डेबल हाउसिंग का हिस्सा लगातार सिकुड़ता जा रहा है। यह विरोधाभास सिर्फ आँकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह मिडिल क्लास के लिए गहरी चिंता का विषय है।


भारत के बडे शहरों में एक नौकरी पेशा कपल के लिए अपना घर खरीदना एक बडी चुनौती बन कर रह गया है, भले ही दोनो की कमाई बहुत अच्छी हो। इस मुश्किल की वजह सैलरी बिल्कुल भी नही है,बल्कि घरों की सप्लाई और उपलब्धता में एक बडा अंतर है। भारत में आज भले ही लाखों घर खाली पडे हो फिर भी किफायती और रहने लायक घरों की बहुत कमी है।
आज भारत के शहरो में डेवेलपर ज्यादा मुनाफे के लिए लग्जरी घर बना रहे है,जबकि असल जरूरत तो मध्यमवर्ग के लिए छोटे और किफायती घरो की है। जमीन की राजनिती,काले धन का प्रवाह और सरकारी नियमों की हिला हवाली की वजह से यह समस्या और भी गंभीर हो गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मिडिल क्लास का अपने घर का सपना अब बस सपना बन कर रह जाएगा?2025 की पहली छमाही में एक करोड़ से ऊपर के घरों की बिक्री ने रेजिडेंशियल सेल्स का 62% हिस्सा कैप्चर कर लिया। यह 2024 की तुलना में बड़ा उछाल है, जब यह हिस्सा 51% था। प्रीमियम सेगमेंट, यानी 1.5 से 3 करोड़ की प्राइस रेंज, में 22% की वृद्धि हुई। लग्जरी सेगमेंट, जिसमें 3 से 5 करोड़ की प्रॉपर्टीज आती हैं, ने 14% की ग्रोथ दिखाई। यहां तक कि अल्ट्रा लग्जरी, यानी 5 करोड़ से अधिक के घरों की बिक्री में भी 8% बढ़ोतरी दर्ज की गई।
दूसरी तरफ अफोर्डेबल हाउसिंग, जो एक करोड़ से कम कीमत की कैटेगरी है, उसकी सप्लाई में 36% की गिरावट आई।आज भारत में 1.1 करोड घर खाली पडे है फिर भी 1.9 करोड घरों की कमी है। यह कमी अधिकांशतः किफायती घरों के सेगमेंट में है। आज समस्या सिर्फ उपलब्धता की नही है,असली समस्या किफायती और रहने लायक घरों की है। पिछले तीन सालों के आँकड़े देखें तो 2022 में जहाँ अफोर्डेबल हाउसिंग की सप्लाई 30,0000 यूनिट थी, वहीं 2024 में यह घटकर सिर्फ 2 लाख यूनिट रह गई। आप को जानकर ताज्जुब होगा कि आज लगभग एक करोड से ज्यादा फ्लैट्स अपने खरीदार का इंतजार कर रहे है। शहरवार विश्लेषण करें तो दिल्ली-एनसीआर में अफोर्डेबल हाउसिंग सप्लाई में 45% की गिरावट आई है। मुंबई में 60% और हैदराबाद में तो 69% तक की भारी गिरावट देखी गई। यह सब उस समय हो रहा है जब मिडिल क्लास की जरूरतें बढ़ रही हैं, लेकिन डेवलपर्स प्रीमियम और लग्जरी हाउसिंग की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं।
इसकी वजह साफ है—उन्हें वहाँ ज्यादा मार्जिन मिल रहा है।यहाँ एक फंडामेंटल स्ट्रक्चरल शिफ्ट नजर आ रहा है। भारत में हाउसिंग मार्केट धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रहा है जहाँ अमीरों और उच्च आय वर्ग के लिए तो पर्याप्त विकल्प हैं, लेकिन मिडिल और लोअर मिडिल क्लास के लिए विकल्प तेजी से कम होते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति सिर्फ अर्थशास्त्र की भाषा में नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी चिंता पैदा करती है। जब अफोर्डेबल हाउसिंग सिस्टमेटिक तरीके से खत्म होगी तो हाउसिंग मार्केट में पॉपुलराइजेशन होगा, यानी एक तरफ अत्यधिक महँगे घर और दूसरी तरफ बहुत सीमित सस्ते घर। बीच का सेगमेंट धीरे-धीरे मिट रहा है। यह स्थिति लंबे समय में सामाजिक असमानता को और गहरा करेगी।
सरकार को इस पर तत्काल कदम उठाना चाहिए। इन ढांचागत समस्याओं ने इस दिक्कत को और भी बढ़ा दिया है. जमीन से जुड़ी राजनीति, फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) की सीमाएं, निवेशकों की सट्टेबाजी और काले धन का लेन देन ये सब मिलकर बाजार को बिगाड रहे है इन सब के बीच फंसा है…मिडल क्लास।


