वाहन भले शत्रु हों, पर मन में प्रेम रहे —यही है शिव परिवार से मिलने वाली शिक्षा।

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डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा/मुंबई वार्ता/ कवि

मुझे शिव परिवार बहुत लुभाता,

उनको देखकर बहुत कुछ सीखने को मिलता,

प्रभु की कृपा बनी रहे अपरंपार,

सबके परिवार में हो अपार प्यार।

देखो-देखो कैलाशपति,

कैलाश पर परिवार संग,

ईश्वर होकर भी समय निकालें,

अपनों के लिए हर पल रंग।

माता पार्वती संग विराजें,

करुणा का प्रतिरूप,

गणपति विघ्नहर्ता पास हैं,

आशीषों का धूप।

कार्तिकेय वीर कुमार,

संग में नंदी बैल,

अशोकसुंदरी सुकन्या संग,

घर आँगन हरपल खेल।

माता का वाहन शेर है,

गणपति का नन्हा चूहा,

कार्तिकेय का मोर है साथी,

शिवजी नंदी पर विराजे संग नाग भी झूले।

शेर नंदी को हानि पहुंचा सकता है,

सर्प चूहे को को खा सकता है,

मोर सर्प को,परिवार में प्रेम बना है,

कोई न छेड़े एक दूजे को।

दुश्मनी के वाहन भी,

पर सब रहते संग-संग,

क्योंकि प्रेम का है बंधन,

यही जीवन का ढंग।

शिव परिवार हमें सिखाता,

चाहे जितना मतभेद,

परिवार में मनभेद न हों,

बढ़े सदा संवाद-सम्वेद।

समय दो अपनों को तुम भी,

यही सबसे बड़ा धर्म,

सुख-दुख में जो संग निभाएँ,

वही है परिवार का कर्म।

“वाहन भले शत्रु हों, पर मन में प्रेम रहे —यही है शिव परिवार से मिलने वाली शिक्षा।”

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