गुरु दर्शन एक परंपरा ही नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक अनुभव : रमणीक मुनिजी मसा.

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मुंबई वार्ता/संजय जोशी

सेंट्रल संघ बेंगलूरु की युवा मंडल टीम की चार दिवसीय गुरु दर्शन यात्रा आज होगी संपन्न, आशीष बाफना ने दी जानकारीबेंगलूरु। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ बेंगलूरु सेंट्रल के मार्गदर्शन में युवा मंडल इकाई के करीब साठ सदस्य टीम ने महाराष्ट्र राज्य के विभिन्न स्थानकों में चातुर्मासार्थ विराजित साधु साध्वीवृंद एवं तीर्थ स्थलों आदि के दर्शन, वंदन, मिच्छामी दुक्कड़म के साथ प्रवचन श्रवण का हर्षोल्लास से लाभ लिया। चार दिवसीय गुरु दर्शन यात्रा रविवार 21 सितंबर को पुणे से हवाई मार्ग से बेंगलूरु पहुंचकर संपन्न होगी।

युवा मंडल के अध्यक्ष प्रदीप धोका एवं मंत्री दीपक लुंकड के नेतृत्व में इस गुरु दर्शन यात्रा की जानकारी युवा कार्यकर्ता आशीष बाफना ने देते हुए बताया कि सोलापुर शनि शिंगणापुर औरंगाबाद जालना अंतरिक्ष पार्श्वनाथ बदनापुर पुणे आदि क्षेत्रों में बेंगलूरु से रेल मार्ग से प्रस्थान कर बाकी स्थानों पर स्लीपर एसी बसों के माध्यम से गुरु दर्शन यात्रा की जा रही है। इस दौरान सर्वप्रथम नगर में धाम दर्शन के बाद क्रमबद्ध यात्रा की गई। अहमदनगर स्थित आनंद धाम में संतश्री कुंदनऋषिजी मसा. एवं आलोकऋषिजी मसा. तथा श्रमण संघीय सलाहकार रमणीकमुनिजी मसा. के दर्शन वंदन तथा अन्य तीर्थ स्थलों पर शीश नवाया। इस दौरान अपने सत्प्रवचन में रमणीकमुनिजी ने बेंगलूरु सेंट्रल की युवा वर्ग की टीम को हौसलाफजाई की।

उन्होंने अपना आशीर्वादी संदेश देते हुए गुरु दर्शन यात्रा को आवश्यक बताया एवं विस्तृत उल्लेख भी किया। वे बोले, जैन धर्म में गुरु दर्शन सिर्फ एक परंपरा ही नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव है। यह शिष्य के जीवन में ज्ञान, प्रेरणा और शुद्धिकरण का स्रोत है जो श्रावक श्राविकाओं को अंतत: मुक्ति की ओर ले जाता है। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि किसी भी श्रद्धावान शिष्य की आध्यात्मिक यात्रा में प्रेरणा, ज्ञान और मार्गदर्शन के रूप में होती है जो उसे मोक्ष मार्ग पर अग्रसर करती है। वे बोले, कोई भी साधु, आचार्य, अथवा गुरु सदैव अपने धर्म का मार्ग दिखाते हैं तथा उनकी भक्ति और समर्पण से शिष्यवृंद अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं।

गुरु दर्शन से आत्म अनुशासन, ज्ञान की प्राप्ति एवं सांसारिक जीवन में विभिन्न बंधनों से सर्वस्व मुक्ति मिलती है। वाणी के जादूगर संतश्री रमणीकमुनिजी ने कहा कि कोई भी साधु गुरु रुप में अपने ज्ञान को शिष्य को विवेक प्रदान करता है, जिससे वह आत्मा के ज्ञान को प्राप्त कर सके व अपने उपदेशों से महावीर की वाणी से, देशना के माध्यम से शिष्य को सही मार्ग दिखाते हैं।

संतश्रीजी यह भी बोले कि गुरु दर्शन से शिष्य की गुरु के प्रति समर्पण की प्रतिबद्धता दर्शाती है साथ ही पांच महाव्रतों के पालन एवं बुरे कर्मों का भी क्षय होता है।

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