मुंबई वार्ता/सतीश सोनी

गुजराती थिएटर, टीवी और सिनेमा में अपने अनोखे स्टाइल, मज़ेदार डायलॉग डिलीवरी और मतलब वाली कॉमेडी से सालों से दर्शकों के दिलों में बसी एक्ट्रेस केतकी दवे आज भी उतनी ही जोशीली और इंस्पायरिंग हैं। ‘सास-ससुर’ से लेकर ‘पति-पत्नी’ तक के रिश्तों को मज़ेदार तरीके से पेश करने वाली और समाज को आईना दिखाने वाली केतकी दवे से बातचीत में, हमने उनके नए नाटक से लेकर थिएटर के बदलते रूप तक कई दिलचस्प बातें सीखीं।


‘वाइफ प्रीमियर लीग’ एक ऐसा नाटक है जिसमें आज के ज़ेन-जी के लिए ह्यूमर में एक ऐसा मैसेज छिपा है जो ज़िंदगी को देखने का उनका नज़रिया बदल सकता है।क्या आप हमें उस नाटक के बारे में बता सकती हैं जिसकी आप अभी रिहर्सल कर रही हैं?मैं अभी ‘वाइफ प्रीमियर लीग’ नाम के एक नाटक की रिहर्सल कर रही हूँ। नाम से ही साफ़ है कि कहानी पति-पत्नी के बीच की है। जैसा कि मैं हमेशा महिलाओं का पक्ष पेश करती हूँ, यहाँ भी हमने कॉमेडी के ज़रिए महिलाओं को हिम्मत देने और इंस्पायर करने की कोशिश की है। हंसी के बिना ज़िंदगी नहीं चल सकती, इसलिए हंसी से मैसेज देना मेरा स्टाइल है।


रसिकभाई और सरिताबेन के साथ कौन सा प्ले आपका फेवरेट है?‘हुन रीमा बख्शी’ मेरा पहला प्ले था, जिसे मेरी मां ने डायरेक्ट किया था। इस प्ले को करते हुए मुझे थिएटर के कई सबक सीखने को मिले। मैंने रसिक दवे के साथ ‘रानी ने जोड़े ते राजा ने तकदीरनो अक्का जो’ जैसे कई हिट प्ले किए। शैलेश दवे के साथ ‘ओलखान’, परेश रावल के साथ ‘मूलराज मेंशन’—ये सभी एक्सपीरियंस आज भी यादगार हैं।
तब और अब: थिएटर में बदलावआपको क्या लगता है कि पहले और आज की थिएटर इंडस्ट्री में क्या फर्क है?
समय के साथ बदलाव तो होता ही है। पहले टीवी-OTT नहीं था, इसलिए बेस्ट टैलेंट थिएटर में ही मिलता था। आज ऑप्शन बढ़ गए हैं। हालांकि, थिएटर में आने वाली ऑडियंस ही असली कनेक्टेड ऑडियंस होती है। लाइव थिएटर का एक्सपीरियंस आज भी यूनिक है।
टीवी, फिल्म और पसंद की सेलेक्टिविटीसीरियल और फिल्मों को लेकर आपका अप्रोच क्या है?
सीरियल में बहुत टाइम लगता है, इसलिए मैं बहुत सिलेक्टिव रहती हूँ। ड्रामा में मुझे हर दिन जीने का एक नया एक्सपीरियंस मिलता है। फिल्मों में ‘पापा वामकु नहीं समझाय’ के बाद बहुत सारे ऑफर आए, लेकिन मुझे अभी तक वो नहीं मिला जो मुझे पसंद है। अगर मुझे इंतज़ार भी करना पड़े तो ठीक है, लेकिन मुझे अच्छा काम करना है।
आज गुजराती फिल्म इंडस्ट्री 200 करोड़ की हो गई है, आप क्या कहते हैं?
यह बहुत खुशी की बात है। सरकारी सब्सिडी, अच्छे प्रोड्यूसर और टैलेंट मिल रहा है। अब गुजराती पीछे नहीं रहेंगे, आगे आएंगे। बातचीत होनी चाहिए और हो रही है। आखिर में… हंसी, एक्सपीरियंस और आइडिया से भरपूर केतकी दवे आज भी उतनी ही एक्टिव हैं। थिएटर के लिए उनका प्यार और महिलाओं के लिए उनका मैसेज उन्हें सिर्फ एक एक्ट्रेस नहीं, बल्कि एक इंस्पिरेशन बनाता है।



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