प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित(कुलगुरू जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय/ दिल्ली)/स्तंभकार/मुंबई वार्ता
“यह लगभग एक सहज धारणा बन चुकी है कि आर्थिक तर्क ही सामाजिक जीवन और समकालीन राजनीतिक गुत्थियों का आधार प्रदान करते हैं, लेकिन अब यह विचार कमजोर पड़ता जा रहा है।“समकालीन समाज और विश्व व्यवस्था पर होने वाली चर्चाओं की एक बड़ी बाधा ‘वैचारिक आलस्य’ है। यह प्रवृत्ति पूरे वैचारिक स्पेक्ट्रम में दिखाई देती है। ‘अर्थव्यवस्था-प्रथम’ के ढांचे—चाहे वे मार्क्सवादी हों, उदारवादी हों या तकनीकी (technocratic)—का लंबे समय तक दबदबा रहा है।
इसी कारण हर तर्क के केंद्र में, चाहे वह समाज से जुड़ा हो या राजनीति से, आर्थिक कारकों या वर्ग संघर्ष को रखने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति बन गई है। यह धारणा कि आर्थिक तर्क ही सामाजिक जीवन का आधार है, अब अपनी चमक खो रही है। इस बीच, राजनीति को केवल अन्य चरों (variables) में से एक बना दिया गया है।

यह आर्थिक ढांचा, जिसकी ओर विद्वान और बुद्धिजीवी आकर्षित होते हैं, आज की दुनिया की व्याख्या करने में कमतर साबित हो रहा है। यदि कुछ है, तो वह यह कि यह अब स्पष्ट करने के बजाय सच्चाई पर पर्दा अधिक डालता है। राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीतिक जीवन में आए बदलावों को देखते हुए, अब समय आ गया है कि हम उस पदानुक्रम को उलट दें जो आर्थिक तर्क को आधार और राजनीति को उसके अधीन मानता है। राजनीति को प्राथमिकता देने का तर्क कोई अलंकारिक भाषा नहीं, बल्कि एक ‘विश्लेषणात्मक सुधार’ है।


इसकी शुरुआत एक बुनियादी प्रस्ताव से होनी चाहिए जिसे आधुनिक टिप्पणियों ने भुलाने की पूरी कोशिश की है: समाज केवल बाजारों के भरोसे नहीं टिके होते। वे अधिकार (authority), वैधता, दायित्व, शक्ति और बल के प्रयोग से जुड़े निर्णयों द्वारा व्यवस्थित होते हैं। ये निर्णय, एक स्तर पर आर्थिक विनिमय से पहले आते हैं, जबकि दूसरे स्तर पर वे इसे बोधगम्य बनाते हैं।इस अर्थ में, ये फैसले आर्थिक होने से बहुत पहले ‘राजनीतिक’ होते हैं।
बाजार अपने आप जैविक रूप से विकसित नहीं होते। इसके बजाय, बाजारों को राजनीतिक ताकतों के माध्यम से अधिकृत, विनियमित, संरक्षित और आवश्यकता पड़ने पर ओवरराइड किया जाता है। इसलिए राजनीति को गौण मानना ‘भौतिक यथार्थवाद’ नहीं बल्कि ‘वैचारिक आत्मसमर्पण’ है। इसे स्वीकार करने का अर्थ भौतिक बाधाओं को नकारना नहीं है, बल्कि उन स्थितियों को स्पष्ट करना है जिनके तहत भौतिक जीवन स्थिरता और अर्थ प्राप्त करता है।
शास्त्रीय राजनीतिक चिंतन में इस वास्तविकता को बिना किसी संकोच के समझा गया था। राजनीति कोई बचा-खुचा वर्ग नहीं बल्कि सामूहिक निर्णय का उच्चतम रूप थी। ‘पोलिस’ (Polis) वह स्थान था जहाँ समुदाय सामान्य भलाई के बारे में तर्क करते थे, संघर्षों को सुलझाते थे और दायित्वों का पदानुक्रम स्थापित करते थे। फिर भी आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत ने, विशेष रूप से मार्क्स की लंबी छाया और बाद में तकनीकी परंपराओं के प्रभाव में, इस समझ को उलट दिया। राजनीति को केवल एक ‘सुपरस्ट्रक्चर’ (अधिसंरचना) बना दिया गया और शक्ति को भौतिक संबंधों के कार्य तक सीमित कर दिया गया।लेकिन यह संकीर्णता अब प्रासंगिक नहीं रही।
समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था के दावों को एक-दूसरे से अलग नहीं रखा जा सकता। इसी तरह, शक्ति केवल आर्थिक संरचना का प्रतिबिंब नहीं है। इसके बजाय, शक्ति अपने आप में एक संगठित सिद्धांत बन गई है, जो आर्थिक प्रोत्साहनों पर प्रतिक्रिया देती है और उन्हें बार-बार नया आकार देती है।
पिछले कुछ समय से, अर्थव्यवस्था-आधारित स्पष्टीकरण कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने में संघर्ष कर रहे हैं, जैसे: “समान आर्थिक स्थितियाँ मौलिक रूप से भिन्न राजनीतिक परिणाम क्यों पैदा करती हैं?”, “विचारधारा वर्ग-विभाजन से परे कैसे लामबंद होती है?”, या “राज्य सुरक्षा, प्रतिष्ठा या रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश में अपने अल्पकालिक आर्थिक हितों के खिलाफ जाकर काम क्यों करते हैं?” इस आर्थिक मॉडल की अपर्याप्तता के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं।यह तब और भी स्पष्ट हो जाता है जब हम शक्ति के संकीर्ण दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘संरचनात्मक शक्ति’ (structural power) को गंभीरता से लेते हैं। सुसान स्ट्रेंज यहाँ एक उपयोगी शब्दावली प्रदान करती हैं, जो चार परस्पर जुड़ी संरचनाओं की पहचान करती हैं: सुरक्षा, उत्पादन, वित्त और ज्ञान। इन्हीं के माध्यम से शक्ति का प्रयोग किया जाता है। ये तकनीकी तर्क द्वारा शासित तटस्थ क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक अखाड़े हैं जो यह तय करते हैं कि “नियम कौन बनाता है”, “लागत कौन वहन करता है” और “लाभ किसे मिलता है”।
सुरक्षा संरचनाएं महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे तय करती हैं कि किन खतरों को मान्यता दी जाए और हिंसा के किन रूपों को वैध माना जाए। उत्पादन संरचनाएं निर्भरता तय करती हैं। वित्तीय संरचनाएं ऋण और मौद्रिक स्थिरता तक पहुंच को नियंत्रित करती हैं, जो बिना किसी प्रत्यक्ष जबरदस्ती के राज्यों को अनुशासित करती हैं। इसी तरह, ज्ञान की संरचनाएं विशेषज्ञता को परिभाषित करने और नीति विकल्पों की सीमाएं तय करने में महत्वपूर्ण हैं।जब हम बारीकी से देखते हैं, तो इन संरचनाओं को जो जोड़ता है वह अर्थशास्त्र नहीं बल्कि राजनीतिक अधिकार है। यह विकल्पों के बनने से पहले ही परिणामों को कॉन्फ़िगर करने की क्षमता है। इस तरह, शक्ति को अब केवल एक ‘आदेश’ के रूप में नहीं देखा जा सकता; यह एक ‘वास्तुकला’ (architecture) के रूप में कार्य करती है, जो स्वयं अखाड़े को आकार देती है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हालिया व्यवधान उतने अजीब नहीं लगते जितने कि कई टिप्पणीकार सुझाव देते हैं। उदाहरण के लिए, ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल (विशेष रूप से दूसरा कार्यकाल) को अक्सर आर्थिक राष्ट्रवाद या संस्थागत बर्बरता के रूप में खारिज किया जाता है, लेकिन वास्तव में वह उसी बात को स्पष्ट कर रहे हैं जिसे उदारवादी वैश्वीकरण ने लंबे समय से छिपा रखा था: आर्थिक व्यवस्थाएं तभी तक जीवित रहती हैं जब तक राजनीतिक सत्ता उन्हें बनाए रखती है। हम इसी तरह की गतिशीलता अन्य प्रमुख शक्तियों में भी देख सकते हैं, चाहे वह यूरोपीय देशों की औद्योगिक नीतियां हों या तकनीकी और महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात के प्रति चीन की नीति। इन सभी उदाहरणों में, व्यापार सुरक्षा के अधीन हो गया है और जुड़ाव मुख्य रूप से संप्रभुता द्वारा संचालित हो रहा है।अर्थव्यवस्था-आधारित स्पष्टीकरण यहाँ यह स्वीकार करने में विफल रहता है कि अर्थव्यवस्था राज्य को निर्देशित नहीं कर रही है। बल्कि, राज्य अर्थव्यवस्था को चला रहा है। यह न तो पूंजीवाद का पतन था और न ही बाजारों की अस्वीकृति, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और शक्ति पदानुक्रम का पुनर्संतुलन था।
प्रतिबंधों, शुल्कों और आपूर्ति-श्रृंखला के पुनर्गठन को नीतिगत विफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि वे बदली हुई प्राथमिकताओं को दर्शाने वाले राजनीतिक निर्णय थे। जो बदला वह शक्ति की उपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी ‘दृश्यता’ थी।यह अहसास हमें मार्क्स और उनके विचारों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। भौतिक जीवन पर मार्क्स का जोर अभी भी इतिहास और राजनीति के बारे में बहुत कुछ समझाता है, लेकिन राजनीति के प्रति उनका दृष्टिकोण हमेशा अतिरंजित रहा है। राजनीति अर्थशास्त्र के बाद नहीं आती। वास्तव में, यह उन स्थितियों को निर्मित करती है जिनके तहत आर्थिक संबंध स्थिरता प्राप्त करते हैं। वर्ग संघर्ष स्वयं उन राजनीतिक ढांचों को मानता है जो कानून, पहचान और सदस्यता को परिभाषित करते हैं। राजनीतिक अधिकार के बिना, आर्थिक श्रेणियां विश्लेषणात्मक रूप से कमजोर बनी रहती हैं।
आर्थिक स्पष्टीकरणों के लंबे प्रभुत्व का एक और परिणाम यह हुआ कि इसने राजनीतिक सोच की शब्दावली को संकीर्ण कर दिया। जब राजनीति को मुख्य रूप से प्रशासनिक नियंत्रण के रूप में देखा जाता है, तो अधिकार, व्यवस्था, संप्रभुता और दायित्व जैसे सिद्धांतों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।भारत में जिसे ‘वैचारिक असंतुलन’ कहा जाता है, वह अनिवार्य रूप से एक गहरा ‘वैचारिक असंतुलन’ है जिसके गंभीर परिणाम हैं। दशकों तक, आर्थिक सुधार को एक राजनीतिक विकल्प के बजाय एक तकनीकी अनिवार्यता के रूप में पेश किया गया। वहीं संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता के सवालों को व्याकुलता या खतरे के रूप में देखा गया।पिछले दशक में शासन (governance) में आए बदलावों ने इस व्यवस्था को हिला दिया है। यह बाजारों को खारिज करके नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं को तय करने में राज्य की भूमिका को पुनः स्थापित करके किया गया है।
कल्याणकारी योजनाओं का वितरण, बुनियादी ढांचे का विस्तार और आर्थिक राष्ट्रवाद को अलग-अलग नीतिगत खानों के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित के बारे में राजनीतिक निर्णय की अभिव्यक्ति के रूप में आगे बढ़ाया गया है।राजनीति की प्रधानता को फिर से स्थापित करना एक नियतिवाद को दूसरे से बदलना नहीं है। राजनीति उतनी ही नियति नहीं है जितनी कि अर्थशास्त्र। लेकिन राजनीति ‘प्राथमिक’ है। यह उन मापदंडों को स्थापित करती है जिनके भीतर आर्थिक जीवन विकसित होता है। यह बाजारों की सीमाओं, संस्थानों की वैधता और सामूहिक हित के अर्थ को परिभाषित करती है।
एक ऐसे युग में जहाँ शक्ति एक बार फिर खुले तौर पर बाजारों, सीमाओं और ज्ञान व्यवस्थाओं को आकार दे रही है, राजनीति को गौण मानना अब संभव नहीं है। राजनीतिक निर्णय मानवीय मामलों में निर्णायक शक्ति बना हुआ है। कोई भी गंभीर राजनीतिक टिप्पणी जो इस आधार से शुरू होने से इनकार करती है, वह तेजी से एक ऐसी दुनिया की व्याख्या करने का जोखिम उठाती है जो अब अस्तित्व में नहीं है।


