मुंबई वार्ता/कवि/सुरेश मिश्र

ओढ़ लबादा निर्धनता का,
माल पुवा छुप-छुप कर खाएं
आओ हम झुनझुना बजाएं


पत्रकार बिक रहे थोक में
चमचे सब जी रहे शोक में
संत संतई छोड़-छाड़कर
समय बिताएं नोंक-झोंक में
खुद उद्योग करें जीभर के
हम लोगों को योग सिखाएं
आओ हम झुनझुना बजाएं।


योगी से गुंडे घबराएं
डाक्टर आतंकी बन जाएं
सत्य सनातन एक न होवे
मिलकर यूं कानून बनाएं
बेड़ी शेरों के हाथों में
कुत्ते पिज्जा-बर्गर खाएं
आओ हम झुनझुना बजाएं।
गांवों से भी गायब धोती,
दादी वृद्धाश्रम में रोती,
मौसी,चाची,बुआ कहां अब
शान हमारे कुल की होतीं
संस्कार को लात मारकर
फूहर-पातर रील बनाएं
आओ हम झुनझुना बजाएं।
कीमत है, पर भाव नहीं है
आंचल में भी छांव नहीं है
जंगल में भी शहर घुस गए
ग्राम बचा है, गांव नहीं है
आम बन गए आम देखिए
वो सब चूस-चूस कर खाएं
आओ हम झुनझुना बजाएं।
जिस पर हमने किया भरोसा
जिसको दिल से पाला-पोसा
अवसर आया कुछ देने का
उलट-पुलट कर उसने कोसा
छले गए हम, तले गए हम,
तिस पर भी वो नमक लगाएं
आओ हम झुनझुना बजाएं।


