मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय

वर्षा गायकवाड़ ने ‘तृतीयपंथी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ का कड़ा विरोध करते हुए इसे “जाचक और क्रूर” करार दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि इस विधेयक को तुरंत वापस लिया जाए, अन्यथा इसे संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा जाए।


लोकसभा में कांग्रेस की ओर से बोलते हुए गायकवाड़ ने कहा कि यह केवल एक विधेयक का विरोध नहीं, बल्कि सरकार की सोच के खिलाफ आवाज है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता और सम्मान किसी सरकार की देन नहीं, बल्कि हर नागरिक के जन्मजात और मौलिक अधिकार हैं।


गायकवाड़ ने आरोप लगाया कि सरकार ने यह विधेयक पेश करने से पहले संबंधित समुदाय या ‘नेशनल कन्वेंशन फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स’ (NCTP) से कोई परामर्श नहीं किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी समुदाय के लिए कानून बनाया जा रहा है, तो उसकी राय को नजरअंदाज करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।


विधेयक के प्रावधानों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि इसमें गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होता है। प्रस्तावित संशोधन के तहत लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद डॉक्टर, अस्पताल और मेडिकल बोर्ड को जानकारी साझा करना अनिवार्य किया गया है, जो मरीज और डॉक्टर के बीच विश्वास को कमजोर करता है।
इसके अलावा, उन्होंने कहा कि इस विधेयक से व्यक्ति के स्वयं की पहचान तय करने का अधिकार सीमित हो जाएगा। अब पहचान प्रमाण पत्र के लिए सरकारी मेडिकल बोर्ड की स्वीकृति आवश्यक होगी, जिसमें जिला कलेक्टर की भूमिका प्रमुख होगी। इससे व्यक्तिगत गोपनीयता और गरिमा को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
गायकवाड़ ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह समाज के संवेदनशील वर्गों को निशाना बना रही है। उन्होंने कहा कि पहले धर्म और जाति के आधार पर विभाजन की कोशिश हुई और अब तृतीयपंथी समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पहले सरकार ने तृतीयपंथी समुदाय को पहचान देने का दावा किया था, लेकिन अब नया विधेयक उसी अधिकार को सीमित करता दिख रहा है।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह इस विधेयक का मौजूदा स्वरूप में विरोध जारी रखेगी और इसे संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ मानती है।


