सुरेश मिश्र/कवि/मुंबई वार्ता

सज्जन न मक्कार चाहिए,मिली जुली सरकार चाहिए।
जिसका गणित न अच्छा होवे,वैसा रिश्तेदार चाहिए।
जो हर सांचे में ढल जाए,कुछ ऐसा किरदार चाहिए।
धार नहीं हो जिस धारा में,मुझे वही आधार चाहिए।


मान सहित इज्जत ले लेवे,कभी न ऐसा हार चाहिए।
खुशी जीत वाली हो जिसमें,हमको वैसी हार चाहिए।
जहां हिसाब रखे जाते हों,कभी न ऐसा प्यार चाहिए।
सपने, सपने जैसा देखे,हमको वैसा यार चाहिए।
उच्च कोटि के नीच मिलें तो,ताकतवर पतवार चाहिए।
जहां भक्त हों निर्मल मन के,वह सांचा दरबार चाहिए।
उसे छोड़िए पल में, जिसको-रिश्तों में व्यापार चाहिए।
मम्मी-पापा अगर साथ हों,तो काहें हरिद्वार चाहिए?


