मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय

करीब तीन दशक पुराने एक सीवेज कंसल्टेंसी अनुबंध से जुड़े कानूनी विवाद में हार के बाद बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर 65 करोड़ रुपये का भुगतान करने की जिम्मेदारी आई है। वर्ष 1995 में करीब 14 करोड़ रुपये के मूल मूल्य वाले इस अनुबंध को लेकर शुरू हुआ विवाद लंबे समय तक अदालतों में चलता रहा और अंततः बीएमसी को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।


यह मामला मुंबई की सीवेज व्यवस्था से जुड़ी कंसल्टेंसी सेवाओं के अनुबंध का है। अनुबंध को लेकर उठे विवाद ने धीरे-धीरे लंबी कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया। लगभग 31 साल तक मामला विभिन्न कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा रहा। इस दौरान मूल अनुबंध राशि पर ब्याज और अन्य कानूनी देनदारियां बढ़ती चली गईं।


रिपोर्ट के अनुसार, जिस अनुबंध की शुरुआती कीमत करीब 14 करोड़ रुपये थी, उसका वित्तीय बोझ अब बढ़कर 65 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यानी मूल राशि की तुलना में बीएमसी को कई गुना अधिक भुगतान करना पड़ेगा। यह मामला इस बात का उदाहरण है कि सरकारी और नागरिक निकायों के पुराने ठेके यदि समय पर विवादमुक्त नहीं किए जाते हैं, तो वर्षों बाद उनका आर्थिक बोझ कई गुना बढ़ सकता है।
बीएमसी पहले भी सीवेज परियोजनाओं में निजी कंसल्टेंट्स पर होने वाले भारी खर्च को लेकर चर्चा में रही है। 2016 में आरटीआई से सामने आई जानकारी के मुताबिक, बीएमसी ने केवल पांच वर्षों में सीवेज परियोजनाओं की कंसल्टेंसी पर करीब 180 करोड़ रुपये खर्च किए थे।
मुंबई की सीवेज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बीएमसी वर्तमान में भी बड़े पैमाने पर परियोजनाएं चला रही है। ऐसे में 1995 के इस पुराने अनुबंध का मामला प्रशासनिक फैसलों, अनुबंध प्रबंधन और लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवादों की कीमत को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस मामले में 14 करोड़ रुपये का मूल अनुबंध करीब तीन दशक बाद 65 करोड़ रुपये की देनदारी में बदल गया है, जिससे बीएमसी के खजाने पर लगभग 51 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।


