असहमति, भ्रम और लोकतंत्र।

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प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुडी पंडित( JNU कुलपति)/ स्तंभकार/मुंबई वार्ता

जब राजनीतिक कलाकार चुने हुए शासन को चुनौती देने और यह सुझाव देने के बीच के अंतर को धुंधला कर देते हैं कि जनसहमति जीते बिना राजनीतिक सत्ता को हटाया जा सकता है, तब हमारे सामने एक गंभीर समस्या खड़ी होती है।लोकतंत्रों की यह एक असुविधाजनक आदत होती है कि वे ऐसे चुनावी जनादेश देते हैं जिन्हें इन लोकतंत्रों के सबसे मुखर स्वयंभू रक्षक स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं।

जब मतदाता जनादेश देते हैं, तो परिणाम का विरोध करने वालों को सरकार को चुनौती देने, उसकी नीतियों पर सवाल उठाने और जनमत जुटाने का पूरा अधिकार है।लेकिन वे तार्किक रूप से यह दावा नहीं कर सकते कि उनकी अपनी राजनीतिक मान्यताएं मतदाताओं की पसंद से अधिक लोकतांत्रिक वैधता रखती हैं। असहमति और भ्रम के बीच का यह महत्वपूर्ण अंतर ठीक यहीं से शुरू होता है।

हाल ही में, हमारे देश में प्रतिनिधित्व का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है, जो न केवल सामाजिक रूप से विविध है बल्कि सांस्कृतिक रूप से जीवंत भी है।चाहे सड़कों पर उतरना हो या सोशल मीडिया पर भड़ास निकालना, ऐसा लगता है कि कोई यह नहीं पूछता कि यह सक्रियता (activism) किस बारे में है, यह क्यों की जा रही है, इसका वित्तपोषण (funding) कौन कर रहा है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे करने का अधिकार किसे है?

कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और विपक्षी नेताओं के इस उलझे हुए, प्रायः भ्रमित समूह को हाशिए पर पड़े लोगों, महिलाओं या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की ओर से बोलने के लिए किसने अधिकृत किया है?उनके प्रतिनिधित्व को एकरूप (homogeneous) मान लिया जाता है, मानो सभी ओबीसी या सभी महिलाएं एक जैसा सोचती हों, उन्हीं बातों पर विश्वास करती हों जिन्हें हाशिए पर पड़े लोगों के ये तथाकथित पैरोकार व्यक्त करते हैं।

त्योहारी सीजन के दौरान विनाश और व्यापारियों के नुकसान का भुगतान कौन करता है? इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने छात्रों के नाम पर होने वाले हिंसक विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए एक ठोस रूपरेखा पेश की, जिसे “द एंटी-रॉयट डॉक्ट्रिन” (दंगा रोधी सिद्धांत) कहा गया। उनके शब्दों में इसका अर्थ है: “यदि आप सड़कों पर उतरते हैं और अराजकता फैलाते हैं… तो हम आपके माता-पिता के बैंक खाते खाली कर देंगे।”यह सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश के मुआवजे का विधेयक है। इसका वांछित प्रभाव पड़ा और सभी तथाकथित छात्र प्रदर्शनकारी तथा युवा कार्यकर्ता गायब हो गए।

यह संदिग्ध गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा वित्तपोषित और स्वतंत्र देशों को अस्थिर करने के लिए छात्रों तथा युवाओं का ढाल के रूप में उपयोग करने वाली “सत्ता परिवर्तन” (Regime Change) की साजिशों पर एक करारा पलटवार है।चुनावी प्रतिनिधित्व के प्रतिस्पर्धी दावों की सबसे स्पष्ट औपचारिक परीक्षा चुनाव ही हैं। वे चुनावों के बीच वकालत (advocacy) की आवश्यकता को समाप्त नहीं करते हैं, लेकिन वे यह स्थापित करते हैं कि जनता ने सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी किसे सौंपी है।

मोदी सरकार को लगातार तीन कार्यकाल दिए जाने के बाद, जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। और वे आगे भी अपना फैसला सुनाएंगे। फिर, सवाल यह है कि ये तथाकथित रक्षक यह समझने में क्यों विफल रहते हैं कि इन सभी समूहों के सदस्यों के पास अपनी स्वयं की समझ (agency), अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अपना अधिकार है।केवल वंचितों के साथ एकजुटता की घोषणा करके प्रतिनिधित्व स्थापित नहीं किया जा सकता। इसे सार्वजनिक जुड़ाव, राजनीतिक भागीदारी और अंततः जिनका प्रतिनिधित्व किया जा रहा है उनके प्रति जवाबदेही के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है और किया जाना चाहिए। यही एक कारण है कि नरेंद्र मोदी की राजनीति ने स्थापित राजनीतिक पदानुक्रमों को असहज कर दिया है। उनकी चुनावी अपील ने उन पुरानी धारणाओं को चुनौती दी है कि कौन राष्ट्रीय राजनीतिक सत्ता संभाल सकता है और भारत की दिशा तय करने में किसकी आवाज मायने रखती है।

कोई भी सरकार से असहमत हो सकता है, उसके रिकॉर्ड की जांच कर सकता है या उसके फैसलों पर सवाल उठा सकता है। लेकिन इसके समर्थकों की प्राथमिकताओं को अज्ञानता, हेरफेर या मिथ्या चेतना का परिणाम मानकर खारिज करना, उन नागरिकों को उसी राजनीतिक स्वायत्तता से वंचित करना है जिसकी रक्षा के लिए लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बनाया गया है। ये परिणाम प्रदर्शित करते हैं कि राजनीतिक सत्ता हमेशा चुनौतीपूर्ण बनी रहती है और मतदाता नाटकीय फैसले दे सकते हैं।वे शासन से जुड़े हर विवाद का निपटारा नहीं करते हैं, लेकिन वे जब भी कोई चुनावी परिणाम किसी पसंदीदा राजनीतिक नैरेटिव के लिए असुविधाजनक होता है, तो उसे अप्रासंगिक मानने की मूर्खता को उजागर जरूर करते हैं।

वास्तव में, चुनावी धांधली के आरोपों की जांच के लिए एक वैध स्थान मौजूद है। गड़बड़ी के विशिष्ट साक्ष्यों की जांच की जानी चाहिए, और संवैधानिक उपचार उपलब्ध रहने चाहिए, चाहे राज्य कोई भी हो या सरकार किसी की भी हो।लेकिन एक आरोप कोई निष्कर्ष नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे चुनावी हार चोरी हुए जनादेश का प्रमाण नहीं होती। विपक्ष की जिम्मेदारी मतदाताओं को यह समझाने की है कि वह एक बेहतर विकल्प प्रदान करता है, न कि केवल अपने समर्थकों को यह समझाना कि राजनीतिक व्यवस्था धांधली से भरी है और सुधार से परे है। परंतु जब राजनीतिक कलाकार चुने हुए शासन को चुनौती देने और यह सुझाव देने के बीच के अंतर को धुंधला कर देते हैं कि जनसहमति जीते बिना राजनीतिक सत्ता को हटाया जा सकता है, तब हमारे सामने एक गंभीर समस्या खड़ी होती है।

कोई आंदोलन केवल इसलिए श्रेष्ठ जनादेश प्राप्त नहीं कर लेता क्योंकि उसके नारे अधिक बुलंद, अधिक आकर्षक हैं, या उसके तख्ते (placards) अधिक नाटकीय हैं, या उसके दावे अधिक विनाशकारी हैं। कसौटी यह है कि क्या वह अपने मौजूदा मतदाताओं के दायरे से बाहर के नागरिकों को आश्वस्त कर सकता है। विदेशी वित्तपोषण के बारे में बढ़ती आशंकाएं भी उतनी ही चिंताजनक हैं, क्योंकि यह पूछना तर्कसंगत है कि अराजकता और भय की इस भाषा को बोलने के लिए राजनीतिक संगठनों को कौन पैसा दे रहा है।बार-बार, विरोध प्रदर्शनों के तरीकों को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि देश को समाधानों या शिकायतों के निवारण की ओर नहीं, बल्कि नफरत, संदेह और हिंसा व अराजकता के उत्सव की भाषा की ओर ले जाया जा सके।

दशहरा और दीपावली जैसे धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक मिलनसारिता और बढ़ी हुई व्यापारिक गतिविधियों के दौर में भी अराजकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। व्यवधान के परिणाम त्योहारी सीजन के दौरान विशेष रूप से दिखाई देते हैं, जब व्यापारी, मजदूर और छोटे व्यवसाय उपभोक्ताओं की बढ़ी हुई गतिविधि पर निर्भर होते हैं।शायद इन्हीं कारणों से, लोकतंत्र को बचाने के लिए किए जाने वाले इन तथाकथित विरोध प्रदर्शनों को जनता, मजदूरों और व्यापारियों द्वारा तेजी से समझा जा रहा है कि वे वास्तव में क्या हैं: भारत को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाना (sabotage करना)।

लोकतंत्र और जन कल्याण के ये तथाकथित रक्षक व्यवधान की लागत को आसानी से नजरअंदाज कर रहे हैं या यह देखने की जहमत नहीं उठा रहे हैं कि उनके तरीके उनके उद्देश्यों के अनुपात में हैं या नहीं। अक्टूबर 2026 में, दिल्ली के व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शनों, सड़क प्रतिबंधों और ग्राहकों की कम आवाजाही के कारण भारी नुकसान की बात कही है।निश्चित रूप से, विरोध करने का अधिकार त्योहारी सीजन के दौरान समाप्त नहीं हो जाता, ठीक वैसे ही जैसे उस सीजन के आर्थिक महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सवाल अब यह नहीं है कि असहमति की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं; वह तो है।

अब सवाल यह है कि क्या कुछ लोगों द्वारा किया जाने वाला राजनीतिक लामबंदी दूसरों पर भारी लागत थोपते हुए अपने उद्देश्यों को पूरा कर सकता है? और जैसे-जैसे अधिक डेटा सामने आ रहा है, हम देखते हैं कि ये लागतें मामूली नहीं हैं।इसलिए, सरकार के प्रति नफरत अब जनता के प्रति ही एक गहरे असंतोष में बदल गई है। यहां डॉ. बी.आर. अंबेडकर की चेतावनी बिल्कुल सटीक बैठती है।

उन्होंने “अराजकता के व्याकरण” (Grammar of Anarchy) के बारे में बात की थी, जो आज हमारे लिए शिक्षाप्रद है। नवंबर 1949 में संविधान सभा के अपने संबोधन में, उन्होंने भारतीयों से सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों से बंधे रहने का आग्रह किया था, और चेतावनी दी थी कि जब तक संवैधानिक रास्ते खुले हैं, तब तक असंवैधानिक तरीकों का सहारा न लिया जाए।

उनका तर्क आलोचना के खिलाफ कोई पूर्ण प्रतिबंध या सरकारों को विपक्ष को दबाने का लाइसेंस नहीं था, बल्कि एक दूरदर्शी चेतावनी थी कि लोकतांत्रिक उद्देश्यों का पीछा संवैधानिक सरकार के अनुकूल तरीकों से ही किया जाना चाहिए। वह चेतावनी सरकारों और विपक्ष दोनों पर समान रूप से लागू होती है: एक चुनी हुई सरकार को जवाबदेह रहना चाहिए, संवैधानिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करनी चाहिए और वैध शिकायतों का समाधान करना चाहिए।विपक्ष के पास सैकड़ों दायित्व हैं, केवल हर बात के लिए सरकार को सत्तावादी बताकर निंदा करना ही उसका काम नहीं है। उसकी अधिक तत्काल भूमिका यह प्रदर्शित करना है कि नीतियां कहां विफल हो रही हैं ताकि उन्हें सुधारा जा सके, यह देखना है कि क्या कोई गलती हुई है ताकि उसे ठीक किया जा सके, और एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में अपने दृष्टिकोण और नीतियों को प्रस्तुत करना है।

इसका उद्देश्य कभी भी हर समय विनाशकारी चेतावनियां चिल्लाने तक सीमित रहना नहीं था।असहमति लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में भ्रम को घर नहीं करने देना चाहिए। वे तब शुरू होते हैं जब एक राजनीतिक खेमा अपनी मान्यताओं को ही मतदाताओं का जनादेश मान बैठने की भूल कर बैठता है। चुनावी जीत हासिल करने में विफलता को विजयी दल या उस दल को वोट देने वाली जनता के खिलाफ विंडीकेशन (शोध-प्रतिशोध) का खेल नहीं बनना चाहिए।

चुनाव जीतने में विफल होने पर आत्म-चिंतन और मौजूदा नीतिगत रुख में संशोधन होना चाहिए, न कि “चुराए गए चुनाव” की घबराहट भरी घोषणाएं करना, हर राज्य तंत्र को “बिकाऊ” कहना और अभद्रता से भरी सड़कों पर लामबंदी की ओर बढ़ना तथा “सत्ता परिवर्तन” का आह्वान करना।लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब सरकारें अपने जनादेश की सीमाओं का सम्मान करती हैं और विपक्ष अपने शासकों को चुनने के लोगों के अधिकार का सम्मान करता है। अपनी तमाम खामियों के बावजूद, भारत की चुनावी प्रक्रिया वह मंच बनी हुई है जिसमें राजनीतिक दावों की अंततः परीक्षा होनी चाहिए।

किसी प्रतिकूल निर्णय का उत्तर जनता को भ्रमित या मूर्ख घोषित करना नहीं है, बल्कि तर्क के साथ उनके पास वापस जाना है। मतदाताओं को अक्षम (imbecile) मानना और अराजक, असंवैधानिक प्रदर्शनों से उनके जीवन को बाधित करना चुनावी परिणामों को नहीं बदलेगा।बल्कि, अगले चुनावी चक्र उनके भ्रम को और दूर ही करेंगे। भारतीय लोकतंत्र लचीला (resilient) है, और इसके नागरिक उन लोगों की तुलना में अधिक समझदार हैं जो राजनीतिक दुश्मनी को लोकतांत्रिक विश्वास समझ बैठते हैं।

कोई भी अभियान, चाहे वह कितना भी तेज, अभद्र या टकरावपूर्ण क्यों न हो, जनता के अपने प्रतिनिधियों को चुनने और उन पर विश्वास करने के अधिकार का स्थान नहीं ले सकता।

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