■ IDBI बैंक में LIC और भारत सरकार की हिस्सेदारी विदेशी निवेशक को बेचने का प्रस्तावित निर्णय वापस लिया जाए।
मुंबई वार्ता संवाददाता

IDBI बैंक में LIC और भारत सरकार की 60.72% हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी ‘फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स लिमिटेड’ को 52,283 करोड़ रुपये में बेचने की केंद्र सरकार द्वारा दी गई मंजूरी गैरकानूनी है। ऐसा निर्णय लेने का अधिकार केंद्र सरकार को नहीं, बल्कि संसद को है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी किसी विदेशी कंपनी को बेचना देशहित में नहीं है, बल्कि यह देश के लिए बेहद खतरनाक है। यह देश की अर्थव्यवस्था पर हमला है। यह गंभीर आरोप लगाते हुए महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख विश्वास उटगी ने मांग की कि IDBI बैंक में LIC और भारत सरकार की हिस्सेदारी विदेशी निवेशक को बेचने का प्रस्तावित निर्णय वापस लिया जाए।


तिलक भवन में आयोजित पत्रकार परिषद को संबोधित करते हुए विश्वास उटगी ने आगे कहा कि IDBI एक सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक है, जिसकी स्थापना भारत सरकार ने वर्ष 1964 में एक ‘डेवलपमेंटल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन’ के रूप में की थी। समय के साथ इसका रूपांतरण एक ‘यूनिवर्सल बैंक’ में हुआ। पिछले पांच वर्षों में इस बैंक के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और यह बैंक भारी मुनाफा कमा रहा है। बैंक के पास मुंबई और हैदराबाद में एक लाख करोड़ रुपये मूल्य की जमीन है तथा देशभर में इसकी 2,200 शाखाएं हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का अनुमान था कि इस बैंक को बेचने से 1 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे। बाद में यह अनुमान घटकर 82 हजार करोड़ रुपये और फिर 72 हजार करोड़ रुपये तक आ गया। अब इसकी बिक्री के लिए 52,283 करोड़ रुपये की कीमत तय की गई है। भारत सरकार का यह कदम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के हितों के खिलाफ है। इन बैंकों ने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी क्षमता साबित की है और ये देश की अर्थव्यवस्था के विकास का एक महत्वपूर्ण साधन हैं। भारत सरकार द्वारा समय-समय पर शुरू की जाने वाली विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में भी ये संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विश्वास उटगी ने आगे कहा कि LIC ने वर्ष 2018 में प्रति शेयर 61 रुपये की दर से IDBI बैंक में निवेश किया था, जबकि अब प्रस्तावित विदेशी निवेशक भारत सरकार द्वारा निर्धारित कीमत से भी कम दर पर ये शेयर खरीदना चाहता है। इस प्रस्तावित प्रक्रिया से पॉलिसीधारकों के हित भी खतरे में पड़ गए हैं।
उन्होंने कहा कि आज सार्वजनिक क्षेत्र के IDBI बैंक को विदेशी कंपनी को बेचने का निर्णय लिया गया है। यह फैसला SBI सहित सार्वजनिक क्षेत्र के 12 महत्वपूर्ण बैंकों के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। केंद्र सरकार की मंशा इन 12 बैंकों को घटाकर केवल तीन बैंक बनाने की है। जब निजी बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा 49 प्रतिशत है, तो फिर सार्वजनिक क्षेत्र के IDBI बैंक की लगभग 61 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी कंपनी को कैसे बेची जा सकती है? यह सवाल विश्वास उटगी ने उठाया।
विश्वास उटगी ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार के इस निर्णय का हम कड़ा विरोध करते हैं। इसी मुद्दे पर मुंबई उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की गई है और इस मामले में सुनवाई शुरू हो चुकी है।


