डाॅ धीरज फूलमती सिंह /स्तंभकार/मुंबई

महाराष्ट्र खासकर मुंबई में मराठी और हिंदी भाषा का विवाद उत्पन्न किया गया है। यह विवाद खालिस राजनीतिक है,अब निकाय चुनाव नजदीक आ रहे है और ऐसे में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए मराठी और हिंदी भाषी लोगो के बीच फूट डालने की भरसक कोशिश कर रहे है।देखा जाए तो मराठी भाषा भारत की प्रमुख भाषाओ में से एक है।


मराठी भाषा का इतिहास और विकास प्राचीन संस्कृत भाषा से हुआ है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे मराठी और हिंदी के चालीस साल पुराने पड चुके राजनीतिक दांव पर फिर से हाथ आजमाना चाहते है लेकिन आज समाज और समय दोनो बदल गया है। सोशल मिडिया और छोटे अखबारों की कतरन को नजरअंदाज कर दें तो जमीन पर कोई खास समस्या नही है। मुंबई सहित महाराष्ट्र का जन जीवन सुचारु रूप से निर्विवाद चल रहा है। जो कुछ भी बवाल है, वह सोशल मिडिया पर ही ज्यादा दिखाई दे रहा है। थोडा बहुत आग में घी डालने का काम इलेक्ट्रॉनिक मिडिया कर रहा है।
आम मराठी माणूस आज भी सबसे सम्मान पूर्वक घुम मिल कर ही रह रहा है। उसे राजनिती से कुछ लेना देना नही है। वह अभी भी सुबह रोजी रोटी के लिए उठता है और रात को चैन की नींद सोना चाहता है। मुंबई को अगर किसी ने अब तक डिस्टर्ब किया है तो वह राजनीतिक दलों के नेताओ के गैर जिम्मेदारी भरे बयान ही है। जन-गण-मन भारत का राष्ट्र गान है लेकिन पूरे भारत में महाराष्ट्र ही इकलौता प्रदेश है,जिसका एक गर्वित राज्य गान है और वह है,जय जय महाराष्ट्र माझा, गर्जा महाराष्ट्र माझा! भारत में राज्यों को बनाने आधार पर ही भाषाई था वर्ना कुछ दसक पहले गुजरात और महाराष्ट्र भी एक ही राज्य थे लेकिन गुजराती और मराठी भाषा के आधार पर इन्हे भी अलग कर दिया गया। ऐसे में मराठी स्मिता को कायम रखना जरूरी है।
अब तक मराठी हिन्दी के विवाद को मैं गंभीरतापूर्वक नही ले रहा था,अपनी रोजमर्रा की दुनिया में मस्त था लेकिन कल मेरे जान पहचान के तीन सम्मानित बुद्धिजीवी शख्सियतों के फोन आ गए जो जाहिर तौर पर मुंबई या महाराष्ट्र के निवासी नही है तो मुझे लगा कि अब मुझे अपनी राय जरूर जाहिर करनी चाहिए। मैं मुंबई में पैदा हुआ हूँ,यहीं पला बढा हूँ और मेरे दोनो बच्चे भी मुंबई में ही पैदा हुए है,यही लिख पढ भी रहे है। ऐसे में मुझे या मेरे बच्चों को मराठी पढने, लिखने और बोलने नही आती है तो फिर यह बात हमारे लिए विचारणीय है।
हमे हर हाल में मराठी भाषा का ज्ञान होना ही चाहिए और हमे है भी।मेरी पत्नी मेरठ में पैदा हुई और फिर वही पली बढी फिर दिल्ली मे भी पढी है तो ऐसे में उसे मराठी भाषा बोलने नही आती तो यह बात समझ में आती है लेकिन वह पिछले तेईस साल से मुंबई में रह रही है, उसका हमेशा अदालत आना जाना होता है,कोर्ट में जिरह भी मराठी में होती है,उसके क्लांईट भी मराठी भाषी है,इतने दिनो से उसकी रोजी रोटी वकालत से चल रही है तो ऐसे में उनको मराठी भाषा की जानकारी न होना,मुझे समझ में नही आता है।….शुक्र है,पत्नी जी की मराठी बोली बहुत अच्छी है। उन्हे बहुत अच्छी मराठी बोलने आती है।
हिंदी सिनेमा की क्या कहूँ,मुंबई तो भोजपुरी सिनेमा का भी घर है। भोजपुरी कलाकार भी मुंबई की वजह से ही अपनी रोजी रोटी चलाते है। भले उनकी फिल्मे उत्तर भारत के भोजपुरी इलाकों में खूब देखी जाती हो लेकिन अधिकांश भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग मुंबई और आसपास के इलाकों में ही होती है। अधिकांश भोजपुरी कलाकार मुंबई में ही रहते है। ऐसे में मुंबई में रहने वाला कोई भोजपुरी सुपर स्टार कहे कि मुझे मराठी नही आती,जो उखाड़ना है, उखाड लो…यह खालिस दादागिरी नही तो और क्या है ?
कोई परदेसी व्यक्ति हाल फिलहाल में मुंबई आया हो और उसे मराठी नही आती है तो यह बात समझ में आती भी है लेकिन अगर कोई शख्स सालों साल से महाराष्ट्र में रह रहा है,व्यापार,व्यवसाय और नौकरी कर रहा है और वह कहे कि मुझे मराठी नही आती तो मैं ऐसे शख्स का विरोध करूंगा। राजनेता हो या भोजपुरी अभिनेता ये लोग अपने गैर जिम्मेदाराना बयानों से मुंबई सहित महाराष्ट्र के समाज में खाई बना रहे है,विवाद पैदा कर आपसी सौहार्द्र को बिगाड रहे है। उन्हे समझ में आना चाहिए कि चालीस साल पुराना राजनीतिक दांव अब चलने वाला नही है क्यों कि काठ की हांडी बार-बार नही चढाई जा सकती है!
पूरे भारत में बोली जाने वाली हिंदी भाषा का सम्मान जरूर होना चाहिए लेकिन मराठी भाषा की किमत पर नही। हिंदी अपने आप में जरूर महान है लेकिन मराठी का भी सम्मान है। महाराष्ट्र में रहने वालों को मराठी का सम्मान जरूर कायम रखना चाहिए। यह भी गौरतलब है कि मराठी भाषा सिखने या बोलने के लिए किसी प्रकार की जोर आजमाईश नही होनी चाहिए। मराठी भाषा न बोलने वालों के साथ जोर जबरदस्ती और गुंडा गर्दी नही होनी चाहिए। ऐसा करने से मराठी भाषा के लिए नफरत ही पैदा होगी! गुंडा गर्दी करके मराठी भाषा का सम्मान नही अपमान ही किया जा रहा है।
मराठी भाषा के समर्थन में गुंडागर्दी करके सिर्फ नेताओ का ही लाभ होने वाला है। पुलिस केस होने पर कार्यकर्ताओ को कोई नेता बचाने नही आएगा। उल्टा उनके कार्यकर्ता सालों साल अदालत के चक्कर काटने को मजबूर हो जाएंगे। इतना सब बवाल होनो के बाद भी मुंबई और महाराष्ट्र का मुल मराठी माणूस हमेशा से ही बहुत प्यारा है, दोस्ताना है।बहुत नेकदिल,मासूम,बेफिक्र और सहयोगी है। परप्रातियो के लिए लाजवाब मेहमान नवाज और मित्र है। इसलिए भी मैं मराठी माणूस का बहुत आदर करता हूँ।


