■ शनि और अतिचारी गुरु का दिखेगा असर.
■ देश दुनिया में युद्ध और प्राकृतिक आपदा के संकेत.
वरिष्ठ संवाददाता मुंबई वार्ता

सनातन ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को कर्मफल दाता कहा जाता है, जो जातक को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। शनिदेव रंक को राजा और राजा को रंक बनाने की ताकत रखते हैं, यही कारण है लोग शनि देव को कभी नाखुश नहीं करते हैं। सूर्य पुत्र शनिदेव रविवार 13 जुलाई से वक्री हो गए हैं। शनिदेव का वक्री होना और साथ में देवगुरु बृहस्पति का अतिचारी होना ब्रह्मांड की ऐसी खगोलीय घटना है जिसका असर 29 नवंबर तक देश दुनिया में देखने को मिलेगा।
ज्योतिषाचार्य डॉ. अशोक मिश्र ने बताया कि ग्रहों की चाल वैश्विक स्तर पर चुनौती पैदा करेगी। शनि देव वक्री होने पर अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं, जिसके कारण प्राकृतिक आपदाओं, देश एवं मानव जीवन में बाधाओं और अप्रिय घटनाओं का कारण बन सकता है। शनि की व्रकी चाल : देश दुनिया पर प्रभावडॉ. अशोक मिश्र के अनुसार शनि देव 13 जुलाई से 28 नवंबर तक व्रक्री रहेंगे। जिसके कारण ऊंचे पद पर बैठे लोगों का व्यक्तित्व और स्वभाव भी प्रभावित हो सकता है। शनि देव के वक्री होने से वैश्विक शांति वार्ता में अवरोध उत्पन्न हो सकता है। शनि के वक्री होने के बाद सिंह राशि में चल रहे केतु और मंगल ग्रह के योग पर भी दृष्टिपात करेगा। केतु मंगल के योग पर राहु ग्रह की भी दृष्टि पड़ रही है। शनि, केतु, मंगल, राहु का योग 28 नवंबर तक बनेगा। इसके कारण इजरायल, फिलिस्तीन, ईरान, रूस, यूक्रेन, भारत, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका में अंतर्विरोध बढ़ेगा।
पश्चिमी देशों में संघर्ष, आतंकी उत्पात, सीमा विवाद जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए सीमा सुरक्षा को लेकर सभी देशों को सतर्क रहना होगा। कुछ देशों में बढ़ते संघर्ष के कारण महायुद्ध अर्थात विश्व युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सूर्य की संक्रांति का भी असर सूर्य देव 16 अगस्त को सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। 16 सितम्बर को कन्या राशि में। इस दौरान भी शनि, केतु, सूर्य, राहु ग्रह आपस में संयोग करेंगे। शनि देव गुरु ग्रह की राशि मीन में वक्री हो रहे हैं। मीन वायु तत्व की राशि है, अतः वायु दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी। युद्ध में वायु सेनाओं की विशेष भूमिका रहेगी। हालांकि कुछ देशों के लिए शनि की उल्टी चाल सकारात्मक भी साबित हो सकती है।
ज्योतिष ग्रंथ फलदीपिका के अनुसार-वक्रे शनिः समुत्पन्ने यः प्रभावो महीतले.स चिरं तिष्ठति लोके, पापं सौख्यविनाशनम्॥अर्थात जब शनि वक्री होते हैं तो लंबे समय तक दर्द देने वाली घटनाओं की शुरुआत करते हैं। यानी इसका असर देश-दुनिया पर देखने को मिलता है। जिन देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है वहां इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देता है, क्योंकि शनि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भी कारक हैं। वर्तमान में शनि मीन राशि में गोचर कर रहे हैं, मीन राशि के स्वामी देव गुरु बृहस्पति हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन देशों का संबंध मीन राशि से है, वहां पर विशेष प्रभाव देखने को मिल सकता है।
■ वक्री शनि के दौरान क्या-क्या हो सकता है ?
13 जुलाई इस दिन से दुनिया में धीरे-धीरे टकराव, धार्मिक झगड़े और जल संकट के लक्षण दिखने को मिल सकते हैं। मीनराशिगतः शनिः वक्रो यदि स्यात् विपदाश्रयः. अर्थात मीन राशि में वक्री शनि हो तो संकट तय है। 4 अगस्त कहीं हमला, आगजनी या बॉर्डर पर फायरिंग जैसी घटना संभव। मंगल शनिदृष्टौ यदा, रणे रुधिरवर्षणम्. अर्थात युद्ध या हिंसा के योग। 11 अगस्तशनि की कुंभ राशि में चंद्रमा का गोचर किसी धार्मिक स्थल या तीर्थ में भगदड़ या उथल-पुथल की संभावना।
चंद्रशनी समायुक्ते शोक: संताप एव च. अर्थात जनता में चिंता और गलतफहमी बढ़ती है। 2-3 सितंबरगुमराह करने वाली धार्मिक बातें, किसी नेता या संस्था का पर्दाफाश हो सकता है। गुरु राहु यदि संयुक्तं धर्मभ्रंशं प्रसादयेत्.16 सितंबरपुल गिरना, बाढ़, जलमार्ग से दुर्घटना के संकेत। शनि–चंद्रमसंयुक्ते… जलप्रलयः.23 सितंबरकिसी देश द्वारा युद्ध की आधिकारिक घोषणा या फिर सैन्य कार्रवाई के संकेत। सूर्यशनी दृष्टियोगे नृपद्वेषो., मतलब सरकारें टकराव की ओर बढ़ती हैं।
■ 28 अक्टूबर बड़ी घटना
युद्ध, प्राकृतिक आपदा या धार्मिक हिंसा के संकेत.29 नवंबर को शनि मार्गीपिछले साढ़े महीनों में युद्ध का नतीजा, बड़े लोगों की गिरफ्तारी, धार्मिक संस्थाओं का बदलना, बड़े स्कैंडल में सजा की प्रक्रिया का आरंभ होना जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती है।


