एकात्म मानववाद के छह दशक: खंडित विश्व के लिए एक वैचारिक ढांचा

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प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित( जेएनयू- कुलपति)/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

हम एक ऐसी तकनीक-संचालित अर्थव्यवस्था का निर्माण कैसे करें जो व्यक्ति को समाज से अलग-थलग न करे? अपने सभ्यतागत मूल्यों को खोए बिना हम राष्ट्रीय शक्ति कैसे प्राप्त करें?1960 के दशक में, जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने बंबई (अब मुंबई) में अपने चार ऐतिहासिक व्याख्यान दिए थे, तब विश्व वैचारिक द्वंद्व के कड़े दौर से गुजर रहा था। उस समय ‘आधुनिक’ होने का अर्थ शीत युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों द्वारा निर्यातित दो विचारधाराओं में से किसी एक को चुनना था: पूंजीवाद का व्यक्तिवाद या समाजवाद का चेहराविहीन सामूहिकतावाद।

उपाध्याय द्वारा ‘एकात्म मानववाद’ का प्रतिपादन केवल एक राजनीतिक-दार्शनिक विचार नहीं था, बल्कि बौद्धिक संप्रभुता का एक साहसिक कार्य भी था।उन्होंने तर्क दिया कि ये दोनों प्रभावी प्रणालियाँ, अपने वैचारिक संघर्ष के बावजूद, एक ही भौतिकवादी सिक्के के दो पहलू हैं—एक व्यक्ति के लालच पर केंद्रित है, तो दूसरा राज्य के तंत्र पर। उनके अनुसार, दोनों में से कोई भी ‘संपूर्ण’ मनुष्य को नहीं समझ सका।

छह दशक बाद, जब नव-उदारवाद (neoliberalism) पर वैश्विक सहमति टूट रही है और समाजवादी यूटोपिया का वादा एक ऐतिहासिक भ्रम बनकर रह गया है, तब एकात्म मानववाद पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। अब यह केवल एक विशिष्ट राजनीतिक यात्रा का अवशेष नहीं, बल्कि गहरे प्रणालीगत संकट से जूझ रही दुनिया के लिए एक नैदानिक उपकरण (diagnostic tool) बन गया है।

भौतिकवादी द्वंद्व से परेबीसवीं सदी की विचारधाराओं की प्राथमिक विफलता मानव स्वभाव के प्रति उनका संकुचित दृष्टिकोण था। आधुनिकता ने मनुष्य को मुख्य रूप से ‘होमो इकोनॉमिकस’ (आर्थिक मानव) यानी उत्पादन और उपभोग की एक इकाई माना है। उपाध्याय का ढांचा यहाँ एक महत्वपूर्ण मानवशास्त्रीय सुधार करता है, जो मानव के चार स्तरों के एकीकरण पर जोर देता है: शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा।

1960 के दशक में यह अमूर्त तत्वमीमांसा लग सकती थी, लेकिन वर्ष 2026 में यह हमारे वर्तमान संकटों की एक सूची जैसी प्रतीत होती है। हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जिसने प्रचुर भोजन के माध्यम से ‘शरीर’ और कंप्यूटिंग शक्ति के माध्यम से ‘बुद्धि’ पर तो महारत हासिल कर ली है, लेकिन हम ‘मन’ और ‘आत्मा’ के वैश्विक पतन के साक्षी बन रहे हैं।

आधुनिक ‘अकेलेपन की महामारी’, विकसित दुनिया में नैदानिक अवसाद (clinical depression) की बढ़ती दर और व्यापक ‘बर्नआउट’ उस समाज के लक्षण हैं जो पेट तो भरता है लेकिन आत्मा को भूखा रखता है।एकात्म मानववाद का सुझाव है कि वह ‘विकास’, जो व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक संतुलन की उपेक्षा करता है, प्रगति नहीं बल्कि एक परिष्कृत क्षय है। यह एकीकृत दृष्टिकोण हमारी समकालीन बहसों को नया आयाम देता है।

उदाहरण के लिए, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर चर्चा अक्सर आर्थिक विस्थापन या एल्गोरिदम के पक्षपात पर केंद्रित होती है। वहीं, एक एकात्म मानववादी दृष्टिकोण अधिक गहरा प्रश्न पूछेगा: मानवीय संज्ञान (cognition) को मशीनों को सौंपने से श्रमिक की ‘बुद्धि’ और ‘आत्मा’ (उद्देश्य) पर क्या प्रभाव पड़ता है? ‘कुशल उत्पादक’ के बजाय ‘एकीकृत मानव’ को केंद्र में रखकर, यह ढांचा उच्च-तकनीकी पूंजीवाद की अमानवीय प्रवृत्तियों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

■ समन्वय की राजनीति

इस ढांचे का दूसरा स्तंभ हमारे राजनीतिक व्यवहारों की संरचना से संबंधित है। मार्क्सवाद के वर्ग-संघर्ष से लेकर उदारवाद के हित-समूहों की प्रतिस्पर्धा तक, अधिकांश पश्चिमी राजनीतिक सिद्धांत ‘संघर्ष’ की अनिवार्यता पर टिके हैं। उपाध्याय का विकल्प ‘समन्वय’ है। उन्होंने यह नादान सुझाव नहीं दिया कि संघर्ष का अस्तित्व नहीं है, बल्कि उन्होंने इसे समाज का आधारभूत सिद्धांत मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि एक स्थिर राज्य व्यवस्था परस्पर कर्तव्य (धर्म) और सामूहिक चेतना या ‘चिति’ की पहचान पर टिकी होती है।

‘चिति’ (राष्ट्र की अंतर्निहित प्रकृति या आत्मा) की यह अवधारणा वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में अत्यंत प्रभावशाली है। हम सार्वभौमिक पश्चिमी मूल्यों के ‘इतिहास के अंत’ वाले युग से निकलकर सभ्यतागत राज्यों (civilisational states) द्वारा परिभाषित ‘बहुध्रुवीय’ विश्व की ओर बढ़ रहे हैं। इस संदर्भ में, भारत जैसे देश केवल रणनीतिक स्वायत्तता के खेल में ‘खिलाड़ी’ नहीं हैं, बल्कि वे ऐतिहासिक चेतना से युक्त नैतिक समुदाय हैं।भारत के लिए इसका तात्पर्य यह है कि विदेश नीति केवल ‘रीयलपॉलिटिक’ (यथार्थवादी राजनीति) का लेन-देन नहीं हो सकती। जब भारत ‘ग्लोबल पब्लिक गुड्स’ का समर्थन करता है—जैसे ग्लोबल साउथ को वैक्सीन उपलब्ध कराना या अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का नेतृत्व करना—तो वह केवल ‘सॉफ्ट पावर’ अंक हासिल नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपनी ‘चिति’ के अनुरूप कार्य कर रहा होता है।

एकात्म मानववाद हमें अपने सभ्यतागत मूल्यों को अपने वैश्विक उत्तरदायित्वों से जोड़ने की शब्दावली प्रदान करता है। यह बताता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक क्षमता से नहीं, बल्कि तीव्र प्रतिस्पर्धा वाली दुनिया में एक स्थिर और नैतिक शक्ति के रूप में कार्य करने की क्षमता से मापी जाती है। यह ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ को ‘आत्माओं के संवाद’ से प्रतिस्थापित करता है।

■ खंडित अर्थव्यवस्था में समृद्धि की नई परिभाषा

उपाध्याय के विचारों का सबसे स्थायी व्यावहारिक योगदान ‘अंत्योदय’ का सिद्धांत है—यानी अंतिम व्यक्ति का उत्थान। जहाँ ‘समावेशी विकास’ एक आधुनिक नीतिगत मुहावरा बन गया है, वहीं अंत्योदय एक अधिक मौलिक वितरण तर्क प्रदान करता है। यह अपना ध्यान कुल सफलता (जीडीपी वृद्धि) से हटाकर हाशिए पर खड़े व्यक्ति की गरिमा पर केंद्रित करता है।पारंपरिक कल्याणकारी मॉडलों के विपरीत, जो गरीबों को राज्य के अधिशेष के निष्क्रिय लाभार्थी के रूप में देखते हैं, अंत्योदय सशक्तिकरण और भागीदारी पर जोर देता है।

यह एक ऐसा आर्थिक दर्शन है जो ‘मानव-पैमाने’ (human-scale) को प्राथमिकता देता है, जो अति-वैश्वीकरण से पीछे हटती आधुनिक दुनिया के अनुकूल है। 2020 के दशक में आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply chain) के व्यवधान और अति-केंद्रीकृत उत्पादन की कमजोरियों ने उपाध्याय के ‘स्वदेशी’ (आत्मनिर्भरता) और विकेंद्रीकरण के विचार को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है।विकेंद्रीकृत, अंत्योदय-केंद्रित अर्थव्यवस्था स्वाभाविक रूप से अधिक लचीली होती है।

यह केवल ‘बड़े पैमाने पर उत्पादन’ (mass production) के बजाय ‘जनता द्वारा उत्पादन’ (production by the masses) को प्रोत्साहित करती है। ऐसे युग में जहाँ ‘प्लेटफॉर्म कैपिटलिज्म’ कुछ डिजिटल केंद्रों में धन केंद्रित करता है, मानव-केंद्रित आर्थिक संरचनाओं का आह्वान भविष्यदर्शी प्रतीत होता है। यह मांग करता है कि तकनीक का उपयोग निचले स्तर के श्रमिक को हटाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाए। यही गरिमा का अर्थशास्त्र है: यह सुनिश्चित करना कि राज्य ‘अंतिम व्यक्ति’ के लिए भोजन सक्षम करे, जबकि वह व्यक्ति भी राष्ट्र की मुख्यधारा में एक सक्रिय, उत्पादक और सम्मानित सहभागी बने। यह दान नहीं, बल्कि सशक्तिकरण है।

आज एकात्म मानववाद से जुड़ने के लिए केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि गहन व्याख्या की आवश्यकता है। इसका स्थायी मूल्य 1965 के स्थिर उत्तरों में नहीं, बल्कि 2026 के लिए सही प्रश्न पूछने में है: हम एक ऐसी तकनीक-संचालित अर्थव्यवस्था का निर्माण कैसे करें जो व्यक्ति को समाज से अलग-थलग न करे? अपने सभ्यतागत मूल्यों को खोए बिना हम राष्ट्रीय शक्ति कैसे प्राप्त करें?इनका उत्तर देने के लिए एकात्म मानववाद को एक बंद विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत ढांचे के रूप में देखना होगा जो नैतिकता को अर्थशास्त्र के साथ और व्यक्ति को समष्टि (सामूहिकता) के साथ जोड़ता है।

इस विचार की विरासत को पिछले 60 वर्षों या केवल घरेलू संदर्भ तक सीमित नहीं रखा जा सकता। किसी विचार की प्रासंगिकता विभिन्न समय की चुनौतियों को समझने और उन्हें हल करने की उसकी क्षमता से मापी जाती है। आज जब दुनिया युद्धों और ध्रुवीकरण के कारण संकट में है, एकात्म मानववाद अपनी बौद्धिक दृढ़ता के साथ खड़ा है और इन चुनौतियों के समाधान के लिए अद्वितीय भारतीय मार्ग प्रस्तुत करता है।

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