बांग्लादेशी नागरिकों की खोज के नाम पर भाजपा कार्यकर्ताओं को मिला रोजगार– एड. अमोल मातेले।

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श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

मुंबई उपनगर में कथित बांग्लादेशी नागरिकों की तलाश के लिए विधानसभा क्षेत्रवार समितियां गठित करने की घोषणा सह-पालकमंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा द्वारा किए जाने के बाद इस कदम पर सवाल उठने लगे हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) के प्रदेश प्रवक्ता एवं युवक मुंबई अध्यक्ष एडवोकेट अमोल मातेले ने इस पहल की आलोचना करते हुए कहा कि यह अभियान वास्तव में अवैध नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई है या फिर भाजपा कार्यकर्ताओं को नया ‘रोजगार’ उपलब्ध कराने का जरिया, यह स्पष्ट होना चाहिए।

मातेले ने कहा कि मुंबई में हाथगाड़ी लगाने वाले, फेरीवाले, निर्माण कार्य में लगे मजदूर और अन्य कामों में बाहरी नागरिकों की बड़ी संख्या लंबे समय से देखी जा रही है। यह स्थिति वर्षों से सबके सामने है, ऐसे में जब भाजपा सत्ता में है तो अब तक इस मुद्दे पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई और अचानक समितियां बनाने की जरूरत क्यों पड़ी, यह सवाल उठता है।

उन्होंने यह भी कहा कि इन समितियों में भाजपा कार्यकर्ताओं को शामिल किए जाने की चर्चा है। यदि ऐसा होता है तो आशंका है कि भविष्य में यही कार्यकर्ता फेरीवालों और हाथगाड़ी वालों से हफ्ता वसूली या उन्हें संरक्षण देने जैसे कामों में शामिल हो सकते हैं, जिससे नागरिकों में चिंता बढ़ रही है। साथ ही कई जगहों पर फर्जी जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराने वाले रैकेट को भी राजनीतिक संरक्षण मिलने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

मातेले ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में अवैध नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर गंभीर है तो सबसे पहले फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क को खत्म किया जाना चाहिए। इसके बजाय समितियां बनाकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अधिकार देने की कोशिश होती दिख रही है।उन्होंने मांग की कि सह-पालकमंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा इन समितियों की संरचना, अधिकार और कार्यप्रणाली की पूरी जानकारी सार्वजनिक करें।

यह भी स्पष्ट किया जाए कि इन समितियों में प्रशासनिक अधिकारी होंगे या केवल पार्टी कार्यकर्ता। अन्यथा जनता के बीच यह धारणा मजबूत होगी कि यह कदम कानून के पालन से अधिक राजनीतिक दिखावा है।

मातेले ने कहा कि मुंबई जैसे महानगर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की है। इसके लिए राजनीतिक समितियों का सहारा लेना प्रशासनिक तंत्र पर अविश्वास दर्शाने जैसा है। इसलिए सरकार को इस मामले में तुरंत पारदर्शी रुख स्पष्ट करना चाहिए।

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