बिंदु से सिंधु की हिंदू चेतना है आरएसएस।

Date:

डॉ रवि रमेशचंद्र, ( तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत केंद्र, अंतराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)/ स्तंभकार/मुंबई वार्ता

एक पत्र और पात्रराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वह वटवृक्ष है जो हिंदू समाज को संगठित और जागृत करता हुआ अनगिनत तने, शाखाओं, वल्लरियों का आकार ले चुका है। इसमें से प्रत्येक में एक प्रत्यक्ष स्वतंत्र अस्तित्व का निर्माण करके कार्य करने की क्षमता आ चुकी है। इसलिए इसके मूल को खोजना एक व्यर्थ बुद्धिबिलास है। लेकिन मूल उतना ही मजबूत और प्रासंगिक बना हुआ है। क्योंकि इसकी जड़ें विचार और त्याग के रूप में भारतीय मृदा में समरस हो चुकी हैं। इसलिए इसका रजिस्ट्रेशन और अन्य बातें दौड़ने का प्रयास करने से खाली हाथ रहने के सिवा कुछ नहीं होगा।

कर्नाटक सरकार के गृह मंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सुपुत्र प्रियांक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत जी को पत्र लिखकर संगठन के कानूनी दर्जे, आय-व्यय के स्रोतों और संवैधानिक जवाबदेही पर विस्तृत जानकारी मांगी है। खड़गे ने स्पष्ट किया है कि यह पत्र उनकी व्यक्तिगत हैसियत से नहीं, बल्कि राज्य सरकार के आधिकारिक पद से लिखा गया है। खड़गे ने आरएसएस से उनके पंजीकरण की स्थिति, फंडिंग (निधि), सांगठनिक संरचना, और जवाबदेही से जुड़े 8 महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं। उनका तर्क है कि 60,000 से अधिक शाखाएं चलाने वाले इतने बड़े संगठन को कानूनी निगरानी और जांच के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। इस पत्र के माध्यम से एक बार फिर से कांग्रेस के नेताओं ने हिन्दू समाज के प्रति विष वमन का पुराना प्रयोग नए ढंग से किया है। विसंगति ये है कि उनके नए मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार स्वयं को गर्व से हिंदू कहते हैं।

■ हिंदू चेतना से प्रस्फुटित दर्शन:

लेकिन आम जन मानस के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि भारत माता के उत्थान और धर्म की रक्षा हेतु 1925 में स्थापित संघ ने सौ वर्षों की कठिन यात्रा तय करते हुए क्या और क्यों किया? उसका औपचारिक पंजीकरण क्यों नहीं? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने से पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि संघ और हिंदू धर्म का संबंध क्या है। जिस प्रकार हिन्दू धर्म अन्य रिलिजन की तरह न तो एक मसीहा/ पैगंबर पर आश्रित है, न ही किसी एक आसमानी किताब से बंधा है और न ही इसका बहुत औपचारिक उपासना स्थल आवश्यक है। उसी तरह संघ भी कोई एक कार्य या मंच नहीं। यह तो हिन्दू धर्म की ऊर्जा की तरह हर जगह व्याप्त है। इसे ‘धारयेत् इति धर्मः’ के प्राचीन दर्शन से समझा जा सकता है। भारत की सांस्कृतिक चेतना का यदि कोई मूलाधार है, तो वह है धर्म। भारतीय परंपरा में धर्म मात्र religion या पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि वह शाश्वत व्यवस्था है जो व्यक्ति, समाज और सम्पूर्ण जगत को धारण करती है। सर्व विदित है कि संस्कृत धातु “धृ” से “धर्म” शब्द बना है, जिसका अर्थ है — धारण करना, टिकाए रखना। इस दृष्टि से धर्म वही है जो अस्तित्व को टिकाए और जीवन को अर्थपूर्ण बनाए।

संघ ने हिंदू समाज के अस्तित्व को टिकाए रखने के लिए उसका संगठन करने का संकल्प लेकर कार्य किया है। वह भारत माता के गौरव के प्रतीकों, मानकों, विचारों और जीवन पद्धति को धारण करता है। इसके लिए उसे न तो 1925 में अंग्रेजी राज में प्रचलित सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 से अनुमति लेने की आवश्यकता थी, और न ही स्वतंत्रता के पश्चात 1950 में लागू हुए संविधान ने ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया है, कि हिन्दू समाज के हित में कार्य करने के लिए किसी रजिस्ट्रेशन का होना जरूरी है। जबकि इसी संविधान का अनुच्छेद 19(1) प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता देता है। इसमें शांतिपूर्ण रूप से कर करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को औपचारिक पंजीकरण की कोई बाध्यता नहीं मिलती। संघ का मूल कार्य और उद्देश्य हिन्दू समाज को जागृत करके संगठित करना है। न कि कोई एनजीओ की तरह पंजीकृत होकर सरकारी अनुदान, फंड या टैक्स इत्यादि की छूट प्राप्त करने जैसा सीमित दृष्टिकोण से कार्य करना। तो आरएसएस समाज का, समाज द्वारा, समाज के लिए कार्यरत एक ऐच्छिक वैचारिक अधिष्ठान है। न की लाभ के लिए बनी कोई कंपनी, या सत्ता प्राप्ति के लिए बनी राजनीतिक पार्टी या चंदे का धंधा करने वाला कोई एनजीओ है, जो रजिस्ट्रेशन करवाके देश और समाज को धोखा देते हैं।

क्या नदी अपना जल सभी को देने के लिए पंजीकरण करवाती है? नहीं। बल्कि उसी नदी का पानी बेचने वाली कंपनी जरूर करवाती है। खड़गे जी शिक्षित मंत्री हैं, यह बात उन्हें जरूर मालूम होगी।ऋत और चिति: बिन्दु से सिन्धु सृजन करता संघ“ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्त पसोऽध्यजायत।” सत्य और ऋत (नैतिक-सांसारिक व्यवस्था) ही धर्म के मूल हैं। ऋग्वेद (10.85.1) संघ इसी नैतिक और सांसारिक व्यवस्था के सिद्धांत को धरातल पर उतारने हेतु शिष्ट, सुविचारी और निस्वार्थ मानव श्रृंखला के निर्माण में लगा है। मानव इतिहास साक्षी है कि कानून और औपचारिक नियमों ने तंत्र और यंत्र भर दिया है, लेकिन उसे चर- अचर सभी के कल्याण में सुनिश्चित करने के लिए समाज की नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति का संवर्धन होना आवश्यक है। संघ यही करता है। भला इसके लिए किस संविधान और पंजीकरण की आवश्यकता है? अगर किसी को बड़ों का सम्मान, सामाजिक समरसता का भाव, धर्म और संस्कृति के प्रति श्रद्धा सिखानी हो तो क्या उसके लिए किसी सरकार से अनुमति लेनी होगी? क्या खड़गे जी यह नहीं जानते? अवश्य जानते होंगे।

■ बिंदु से सिंधु तक संघ विचार:

आरएसएस की कार्यपद्धति उसके विचारों और व्यवहार की एकरूपता में स्पष्ट दिखती है। संघ अपनी बैठकें ऋग्वेद के मंत्र, ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।’ से करता है। यह पंक्ति ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 191, मंत्र 2) का एक अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली वैदिक मंत्र है। यह मंत्र सामूहिक एकता, सद्भाव, और सहयोग का प्रतीक है। क्या इन सनातन मूल्यों की आवश्यकता समाज में सबसे अधिक नहीं है? निश्चित है। क्या खड़गे जी या कांग्रेस यह मानती है कि एकता, सद्भाव, परोपकार और सहयोग रजिस्ट्रेशन और सरकार को सूचित किये बिना नहीं हो सकता है? संघ के सभी कार्यक्रम जिसमें ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः’ के कल्याण मंत्र के साथ समाप्त होते हैं। क्या सम्पूर्ण विश्व के हर मनुष्य, प्रकृति और जीवो के कल्याण की कामना और उसके लिए संगठित प्रयास करने की लिए रजिस्ट्रेशन आवश्यक है? यदि ऐसा होता तो प्राचीन काल से वेदों के मंत्र हिंदू समाज की प्रेरणा नहीं बने रहते। ये तबके हैं जब न तो अंग्रेज थे, न कांग्रेस और न ही खड़गे जी।

“धर्मो रक्षति रक्षितः।” अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। महाभारत (शांति पर्व, 109.10) धर्मरक्षा को संघ ने सदैव प्राथमिक कर्तव्य माना है। इसीलिए आंतरिक और वाह्य भारत विरोधी, हिंदू विरोधी शक्तियों ने इसे हमेशा निशाने पर रखा है। यदि भारत की रक्षा होनी है, तो उसके लिए हिंदू धर्म और परंपराओं का सदैव शसक्तीकरण आवश्यक है। यह वैकल्पिक नहीं। संघ विचारों का अनुकरण करती पंजीकृत संस्थाएंआरएसएस अपने आपमें चेतना है। जिसके संपर्क में आकर करोड़ों लोगों ने जन कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, समाजसेवा, अनाथ आश्रम, विद्यालय, अस्पताल, विश्वविद्यालय, कॉलेज, प्रकाशन संस्थाएं, समाचार पत्र – पत्रिकाएं, धार्मिक सांस्कृतिक ट्रस्ट, किसानों के संगठन, मजदूरों के संगठन, छात्रों के संगठन, वित्तीय संगठन, बैंक, राजनीतिक संगठन के माध्यम से समाज और राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। खड़गे जी जानते हैं कि ये सभी पंजीकृत हैं। ये सभी अपने क्षेत्र में सबसे बड़े, सबसे अच्छे और विश्वसनीय संगठन हैं। इसी प्रकार संघ के अनेकों आयाम, सेवा कार्य भी पंजीकृत हैं। और ये सभी जनता के बीच प्रत्यक्ष रूप में कार्य कर रहे हैं। संघ का जो भी है सब सार्वजनिक है, कुछ भी गोपनीय नहीं है। चाहे तो खड़गे जी अपने पिताजी के साथ संघ के किसी कार्यक्रम या नियमित शाखा में जाकर स्वयं देख लें।

संघ की मूल इकाई किसी भी प्रकार का सरकारी अनुदान नहीं लेती। इसका सारा खर्च गुरुपूर्णिमा के अवसर पर स्वयं सेवकों द्वारा अर्पण की गई गुरु दक्षिणा से चलता है। सभी कार्यक्रम आम जनता के सहयोग और आर्थिक योगदान से किए जाते हैं। शायद खड़गे जी ये सब नहीं जानते। या फिर दिन में आँख बंद करके रात की घोषणा का स्वांग कर रहे हैं। पर वे एक सम्मानित जनप्रतिनिधि हैं तो उन्हें स्व विवेक प्रयोग करना चाहिए। यह भी सतर्कता बरतें कि उनके पत्र की आड़ में वामपंथी, हिंदू द्वेषी और देश विरोधी ताकतों को अपना एजेंडा और टूलकिट सक्रिय करने की ऊर्जा न मिल जाए। इसका नुकसान कांग्रेस अनेकों चुनावों में झेल चुकी है। संघ व्यक्ति निर्माण की साधना का नाम है। यह हर जाति, धर्म, पंथ, लिंग और राजनीतिक विचारधारा के लिये खुला है। बस वे समाज तोड़क और राष्ट्रविरोधी न हों। इससे निकले लोग आज भारत सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय स्वशासन बैंक, रेलवे, पोस्ट ऑफिस जैसे हर एक विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

संघ से जुड़े लोग निष्ठावान, विनम्र, सेवाभावी और समरसता के साथ जहां भी नौकरी करते हैं एक अलग सकारात्मक छवि निर्माण करते हैं। क्या संघ की शाखा और उसके हिंदुत्व के विचार से जुड़े हर भारतीय को अपना एक पंजीकरण करना होगा?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

प्रमुख खबरे

More like this
Related