प्रो. शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित कुलगुरु[जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU)]/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

■ भूमिका:
बौद्धिक दासता और सभ्यतागत संकटदशकों से भारतीय बौद्धिक जगत एक मौन किंतु गहरे संकट से जूझ रहा है: सभ्यतागत आत्मविश्वास की निरंतर कमी। हमारे विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक विमर्शों में दिशा और प्रमाण के लिए बाहर देखने की एक आदत विकसित हो गई है। हम चेतना को समझने के लिए डेकार्ट, ज्ञानमीमांसा के लिए कांट और कार्य-कारण संबंध के अध्ययन के लिए ह्यूम की ओर सहज रूप से मुड़ते हैं। यद्यपि पश्चिमी परंपराएं सुदृढ़ हैं, त्रासदी इस मौन धारणा में निहित है कि गंभीर दार्शनिक जांच केवल उन्हीं से शुरू और उन्हीं पर समाप्त होती है।इस बाह्य दृष्टि ने हमें निर्माता के बजाय केवल उपभोक्ता बना दिया है। हालांकि, अब भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के उद्भव के साथ एक शांत क्रांति जारी है।


IKS का मूल आधार संकीर्णतावाद नहीं, बल्कि यह मान्यता है कि भारत के पास स्वयं की विशाल, सुसंगत और विश्लेषणात्मक वैचारिक प्रणालियां हैं। इन प्रणालियों का पुनरुद्धार ही भारतीय मानस को औपनिवेशिक हैंगओवर से मुक्त करने और हमारे बौद्धिक विमर्श को पुनर्जीवित करने का एकमात्र मार्ग है।धर्मकीर्ति: तर्कशास्त्र के शिखर पुरुषसभ्यतागत विस्मृति की गहराई को समझने के लिए हमें सातवीं शताब्दी के दक्षिण भारतीय बौद्ध दार्शनिक और तर्कशास्त्री धर्मकीर्ति के जीवन और उनकी मेधा को देखना होगा। नालंदा महाविहार की उनकी बौद्धिक यात्रा ने उन्हें इतिहास के सबसे दुर्जेय मेधावियों में स्थापित किया। उन्होंने बौद्ध दर्शन और भारतीय ज्ञानमीमांसा (Epistemology) के परिदृश्य को मौलिक रूप से नया आकार दिया।


धर्मकीर्ति उस प्राचीन तर्क परंपरा के शिखर हैं, जो इस औपनिवेशिक मिथक को ध्वस्त करती है कि भारतीय विचार केवल ‘रहस्यमयी’ या ‘परलौकिक’ थे।धर्मकीर्ति का प्राथमिक केंद्र प्रमाणशास्त्र था। अपने पूर्ववर्ती दिङ्नाग के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ‘प्रमाणवार्त्तिक’, ‘न्यायबिंदु’ और ‘प्रमाणविनिश्चय’ जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना की। उन्होंने बौद्ध मोक्षशास्त्र (Soteriology) को अकाट्य तर्क की नींव पर स्थापित करने का प्रयास किया।दार्शनिक आधार: प्रत्यक्ष और अनुमानधर्मकीर्ति अपने दर्शन में अत्यंत अनुभववादी और तर्कसंगत थे। उन्होंने ज्ञान के केवल दो वैध साधन (प्रमाण) स्वीकार किए: प्रत्यक्ष: वास्तविकता का सीधा, निर्विकल्प बोध, जो भाषा और श्रेणीबद्धता से पूर्व का शुद्ध अनुभव है।
■ अनुमान:
वह तार्किक प्रक्रिया जिसके माध्यम से हम उन वस्तुओं को समझते हैं जिन्हें सीधे प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता।इन उपकरणों के माध्यम से उन्होंने क्षणिकवाद (अस्तित्व की निरंतर परिवर्तनशीलता) और अनात्मवाद (स्थायी आत्मा का अभाव) के सिद्धांतों की रक्षा की। उनका ‘अपोह’ सिद्धांत (अर्थ का अपवर्जन सिद्धांत) भाषा दर्शन में क्रांतिकारी था, जो फर्डिनेंड डी सोसर जैसे आधुनिक भाषाविदों से एक सहस्राब्दी पूर्व ही यह स्थापित कर चुका था कि शब्द शाश्वत तत्वों को नहीं, बल्कि अपने विपरीत के निषेध (जैसे: ‘गाय’ वह है जो ‘गैर-गाय’ नहीं है) को दर्शाते हैं।वाद परंपरा और सभ्यतागत लोकाचारधर्मकीर्ति की प्रासंगिकता उनके विचारों के साथ-साथ उनके विश्व के साथ जुड़ाव की पद्धति में भी है। वे ‘वाद’ परंपरा के महापंडित थे। भारतीय परंपरा में ज्ञान एक संचयी प्रयास रहा है। धर्मकीर्ति ने न्याय और मीमांसा जैसे प्रतिद्वंद्वी हिंदू दर्शनों के साथ अत्यंत सूक्ष्म और गहन विमर्श किया। उन्होंने विपक्षी तर्कों को उनसे भी बेहतर ढंग से समझा और फिर अत्यंत सटीक प्रति-तर्क प्रस्तुत किए।यही परंपरा आगे चलकर आदि शंकराचार्य के कार्यों में भी दिखाई देती है।
यद्यपि धर्मकीर्ति और शंकर परस्पर विरोधी वैचारिक ध्रुवों पर खड़े थे—जहाँ एक क्षणिकवाद के पक्षधर थे, वहीं दूसरे शाश्वत चेतना (अद्वैत) के—किंतु उनके बीच का यह बौद्धिक संघर्ष तलवारों से नहीं, बल्कि ‘अवयव’ और ‘तर्क’ से लड़ा गया। यह एक आत्मविश्वास से भरी सभ्यता की पहचान है जहाँ ‘पूर्वपक्ष’ (विपक्ष के मत को खंडन से पूर्व पूर्णतः समझना) की अनिवार्यता थी।IKS और भविष्य की राहलंबे समय तक हमने अपने प्राचीन ग्रंथों को केवल धार्मिक श्रद्धा की वस्तु माना, उन्हें दर्शन, तर्क और भाषाविज्ञान के जीवंत ग्रंथों के रूप में नहीं देखा। धर्मकीर्ति को केवल ‘धार्मिक इतिहास’ तक सीमित करना और पश्चिमी विचारकों को ‘सार्वभौमिक तर्क’ का दर्जा देना हमारे अपने बौद्धिक विरासत के साथ अन्याय है।
IKS के माध्यम से धर्मकीर्ति से जुड़ना केवल अतीत के गौरव का स्मरण नहीं है, बल्कि यह बौद्धिक सशक्तिकरण का अभ्यास है। जब एक आधुनिक छात्र यह जान लेता है कि प्रत्यक्षीकरण और भाषा के जटिल प्रश्नों पर नालंदा में एक हजार साल पहले ही सर्जिकल परिशुद्धता के साथ चर्चा हो चुकी थी, तो यह उसके बौद्धिक डीएनए को बदल देता है।हमे पश्चिम के साथ जुड़ना चाहिए, लेकिन बराबरी के स्तर पर। यदि हम अपनी परंपराओं से अनभिज्ञ होकर वैश्विक मंच पर बैठेंगे, तो हम सदैव अनुगामी ही रहेंगे। हमें पहले अपने घर से शुरुआत करनी होगी।
धर्मकीर्ति, उदयन, अभिनवगुप्त और शंकर जैसे दिग्गजों द्वारा छोड़े गए दार्शनिक रत्नों को पहचानना होगा। IKS वह तंत्र है जो इन ग्रंथों को मृत इतिहास के बजाय जीवित ढांचे के रूप में प्रस्तुत करता है, जो आधुनिक संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी सीमाओं पर भी प्रासंगिक हैं।धर्मकीर्ति अपनी पैनी तार्किकता के साथ इस बात के प्रतीक हैं कि जब भारतीय मानस पूर्ण संप्रभुता के साथ कार्य करता है, तो वह क्या हासिल कर सकता है। समय आ गया है कि हम उस विरासत पर अपना अधिकार पुनः प्राप्त करें और अपने भविष्य के लिए एक आत्मविश्वासपूर्ण मार्ग प्रशस्त करें।


