ज्ञानेन्द्र मिश्र/ मुंबई वार्ता/स्तंभकार

भारत के नए मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई ने रविवार, 18 मई 2025 को कहा— न तो न्यायपालिका सर्वोच्च है और न ही कार्यपालिका, बल्कि भारत का संविधान सर्वोच्च है, और इसके स्तंभों को मिलकर कार्य करना चाहिए।मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार संभालने के बाद से न्यायमूर्ति बी. आर. गवई अपने क्रांतिकारी विचारों और कार्यों के कारण लगातार चर्चा में बने हुए हैं।उनके ये कार्य और टिप्पणियाँ उन सभी लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरी हैं जो सिर्फ उच्च न्यायालयों में ही नहीं, बल्कि समग्र न्यायिक व्यवस्था में परिवर्तन की प्रतीक्षा वर्षों से करते आ रहे थे।


भारत के उच्च न्यायालयों में हर प्रकार का आधिकारिक संवाद अंग्रेज़ी में ही होता है। याचिकाकर्ता या प्रतिवादी चाहे किसी भी भाषा पृष्ठभूमि से क्यों न हो, अगर उसे अंग्रेज़ी नहीं आती तो भी वह पूरी कार्यवाही को अंग्रेज़ी में ही झेलेगा।
● सोचिए:
मुअक्किल का मुकदमा, मुअक्किल की तकलीफ़, मुअक्किल का पैसा, मुअक्किल का समय, मुअक्किल के पैसों से पलने वाला कोर्ट— फिर भी मुअक्किल को यह अधिकार नहीं कि वह अपनी ही पैरवी को समझ सके। वकील, जज और गवाह अंग्रेज़ी में बहस कर रहे हैं और मुअक्किल समझ ही नहीं पा रहा कि बात क्या हो रही है। अंत में निर्णय आ जाता है, लेकिन मुअक्किल को समझ नहीं आता कि आख़िर हुआ क्या। लोकतंत्र में यह एक बहुत बड़ा मज़ाक है— हालांकि ऐसे अनेक मज़ाक लोकतंत्र में हैं, लेकिन यह मज़ाक सदियों से बना हुआ है, और कोई भी इसके समाधान की तरफ़ गंभीरता से नहीं बढ़ा।लेकिन उम्मीद की प्रथम रोशनी तब दिखी जब मराठी पृष्ठभूमि से आने वाले नए मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई— जो चाहते तो अंग्रेज़ी या मराठी में शपथ ले सकते थे— उन्होंने हिंदी में शपथ ली।
● इस एक निर्णय में उन्होंने दो गहरे संदेश दिए:
मुख्य न्यायाधीश की दृष्टि उच्च न्यायालय की भाषा नीति पर केंद्रित है।हिंदी एक राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने की क्षमता रखती है। उन्होंने अपने राष्ट्रवादी चरित्र और इसके भावी सकारात्मक परिणामों की ओर संकेत किया।इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं होगा कि आने वाले समय में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भाषा को लेकर कोई बड़ा बदलाव दिखाई दे— और यह बदलाव लोकतंत्र की पहुँच को जन-जन तक ले जाने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
● एक और क्रांतिकारी टिप्पणी:
जो दूसरी सबसे गहरी और गंभीर टिप्पणी उन्होंने दी— उसने राष्ट्र हित के लिए चिंतित एक बहुत बड़े वर्ग को नई उम्मीद दी: “मैं दलित, मगर मेरा बेटा नहीं!”
इस वाक्य के माध्यम से उन्होंने सरकार को एक दिशा दी है—सोचिए कि वास्तविक लाभ किसे मिलना चाहिए? आरक्षण का लाभ किसे चाहिए— और कौन इस लाभ से अब भी वंचित है?उन्होंने समाधान भी दिया— कि जिन परिवारों को एक बार आरक्षण का लाभ मिल चुका है, उनकी अगली पीढ़ियों को वह लाभ क्यों दिया जाए?यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी है। अगर वर्तमान सरकार इसे दिशा-निर्देश मानकर कानून में रूपांतरित करती है, तो भारत में इसके क्रांतिकारी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
● उदाहरण स्वरूप:
मान लीजिए एक आरक्षित वर्ग का परिवार A है जिसे आरक्षण का लाभ मिल चुका है और दूसरा परिवार B है जो अब भी वंचित है।समय बीतने पर जब परिवार B के बच्चे आरक्षण के अंतर्गत अवसरों के लिए प्रयास करेंगे, तो उन्हें A के बच्चों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी— जिन्हें पहले से ही आरक्षण के लाभ से बेहतर शिक्षा, ट्यूशन, ऑनलाइन संसाधन मिल चुके हैं।तो बराबरी कभी नहीं हो पाएगी, और परिवार B फिर वंचित ही रहेगा जबकि A दोबारा लाभ लेता रहेगा— और यह दुष्चक्र चलता रहेगा।इसलिए सरकार को चाहिए कि मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की इस टिप्पणी को एक नीतिगत दिशा मानकर समाज के उन सभी लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुँचाने का प्रयास करे जो अब भी वंचित हैं।इस नीति से राजनीति और समाज में एक *गहरा परिवर्तन आएगा—यदि इस दिशा में संविधान संशोधन हो गया तो जो लोग एक बार आरक्षण का लाभ ले चुके होंगे, वे सामान्य वर्ग में शामिल हो जाएंगे। इससे जो राजनीतिक दल आरक्षण की राजनीति करते हैं और समाज के कमजोर वर्ग को जानबूझकर गरीब बनाए रखते हैं— उनकी राजनीति दम तोड़ देगी।समय के साथ आरक्षित वर्ग के भीतर की गरीबी और कमजोरी घटेगी, और एक दिन पूरा समाज सामान्य वर्ग में आ जाएगा। जाति आधारित राजनीति का अंत होगा, सामाजिक समरसता का उदय होगा, और भारत अपनी श्रेष्ठता की नई ऊँचाइयों को छू सकेगा।
● निष्कर्ष:
आदरणीय मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की इस उच्च नैतिक सोच और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को देखते हुए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आने वाले समय में हमें न्याय व्यवस्था में कई मूलभूत परिवर्तन देखने को मिलें— जैसे कि भ्रष्टाचार पर लगाम, पारदर्शी नियुक्तियाँ और न्यायिक सक्रियता में नवाचार।


