पं0 राजीव पाठक/मुंबई वार्ता

मचल रहा मन कहने को कुछ वर्तमान की गर्दिश पर ।
क्या होगा भावी भारत का विकृत नवयुग की साज़िश पर ।।
मानवता को शर्मसार कर नैतिकता का बोध कराते ।
चुल्लू भर पानी कहां मिलेगा जिसमें हम अब डूब नहाते ।।


बड़ों के आगे बच्चे भी अब मर्यादा का त्याग कर चुके ।
लानत है ओछी हरकत पर जो शर्म, हया भी त्याग कर चुके ।।
शिक्षा-स्वार्थ का हुआ मिलन तब सेवा , समर्पण कहां दिखे ।
लोलुपता , कामुकता से नर अब विकासवाद की नींव रखे ।।
नापाक चमन चमचों भला अब तो सुधर जाओ ।
खुद से खुद की जवाबदेही पर तो तनिक लौट आओ ।।
भौतिकता का नशा चढ़ा तो संस्कृति सभ्यता से दूर हुए ।
विकृत मानसिकता लिए पशुवत व्यवहार प्रकट किए ।।
दुर्नीति से प्रेरित होकर भला कब किसका उत्थान हुआ ।
आतंक , उत्पीड़न भी भला कब से समाधान बना ।।
सेना के बलिदान , त्याग का अपमान भला कहाँ जरूरी था ।
प्रतिशोध – न्याय की चाहत में अपशब्द निदान ही जरूरी था ।
अब भी समय बचा है प्यारे ! रुको तनिक विचार करो ।
राजनीति की प्रतिपक्षी आंधी से आँखों का तिनका साफ़ करो ।।
संकुचित विचारधारा से ऊपर करो राष्ट्रहित का सम्मान जरा ।
नादानी की किलकारी त्याग कुछ कर लो सम्यक संधान जरा ।।


