भरतकुमार सोलंकी/मुंबई
मुलुंड के नव निर्मित मनपा हॉस्पिटल के निजीकरण का विरोध जोरों पर हैं। लेकिन विरोध करने वालों से एक सीधा सवाल—क्या आप या आपका परिवार कभी मनपा अस्पताल में इलाज करवाने गए हैं? अगर नहीं, तो क्यों?दरअसल, विरोध की राजनीति करना आसान है, मगर हकीकत यह हैं कि सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं हैं।
आए दिन डॉक्टरों की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता, जर्जर इमारतें, गंदगी, मशीनों की खराबी और लापरवाह प्रशासन की खबरें आती रहती हैं। सवाल उठता है—जो लोग निजीकरण के खिलाफ हैं, क्या उन्होंने कभी इन अव्यवस्थाओं पर आवाज़ उठाई? क्या कभी सरकार को चिट्ठी लिखी? क्या कभी जन आंदोलन किया?मनपा के हर अस्पताल में मरीजों की लंबी कतारें हैं, मगर क्या वहां पर्याप्त डॉक्टर और आधुनिक जांच सुविधाएं हैं? एक्स-रे मशीन, ईसीजी, पैथोलॉजी लैब जैसी बुनियादी सुविधाओं की हालत कैसी है? अगर सरकारी व्यवस्था इतनी ही अच्छी है, तो फिर अधिकांश लोग निजी अस्पतालों की तरफ क्यों भागते हैं?
विरोध का अधिकार सबको हैं, मगर विरोध करने से पहले यह भी देखना होगा कि समस्या क्या हैं और उसका समाधान कैसे हो सकता हैं। क्या निजीकरण से सेवाओं में सुधार आएगा? क्या इससे गरीबों को बेहतर इलाज मिलेगा? या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर लोगों की भावनाओं से खेलने की कोशिश हैं?अगर निजीकरण गलत हैं, तो सरकारी अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए अब तक क्या किया गया? सवाल सिर्फ विरोध का नहीं, बल्कि समाधान का भी हैं।जो भी निजीकरण का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह जवाब देना चाहिए कि वे मनपा अस्पतालों की मौजूदा दुर्दशा पर कब और क्या कदम उठाएंगे?


