मुंबई वार्ता/सतीश सोनी

वसई-विरार नगर निगम के पूर्व आयुक्त अनिल कुमार पवार, शहरी नियोजन उप निदेशक (निलंबित) वाईएस रेड्डी और चार अन्य को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को गिरफ्तार कर लिया। ईडी ने वसई-विरार में अनधिकृत निर्माण के मामले में यह कार्रवाई की। आरोपियों में पूर्व पार्षद और निर्माण पेशेवर सीताराम गुप्ता और अरुण गुप्ता भी शामिल हैं।


सभी आरोपियों को आज पीएमएलए अदालत में पेश किया जाएगा।गिरफ्तार आरोपियों के नाम पूर्व आयुक्त (वसई विरार) अनिल कुमार पवार, शहरी नियोजन उप निदेशक (निलंबित) वाईएस रेड्डी, पूर्व पार्षद सीताराम गुप्ता और अरुण गुप्ता हैं। ईडी के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस खबर की पुष्टि की है। ईडी ने पवार के आवास समेत १२ ठिकानों पर छापेमारी की थी। इनमें वसई-विरार, मुंबई, पुणे और नासिक के ठिकाने शामिल हैं। छापेमारी में पवार के नासिक स्थित रिश्तेदार के घर से १.३३ करोड़ रुपये की नकदी जब्त की गई। इसके अलावा, सूत्रों ने बताया कि इस कार्रवाई में संपत्ति के दस्तावेज़ भी ज़ब्त किए गए हैं। नासिक और पुणे में हुई छापेमारी में अनिल कुमार पवार से जुड़ी बेहिसाब संपत्तियों की जानकारी मिली है। कुछ समझौता ज्ञापन भी मिले हैं। पता चला है कि एक गोदाम खरीदने का लेन-देन चल रहा है। ईडी को कुछ फ़र्ज़ी कंपनियों की भी जानकारी मिली है।रेड्डी से जुड़े ठिकानों पर की गई छापेमारी में ८ करोड़ ६० लाख नकद और २३ करोड़ २५ लाख के हीरे के आभूषण और सोना ज़ब्त किया गया। इसके साथ ही कई आपत्तिजनक दस्तावेज़ भी ज़ब्त किए गए।ईडी ने मीरा-भायंदर पुलिस कमिश्नरेट द्वारा दर्ज विभिन्न अपराधों के आधार पर इस मामले की जाँच शुरू की थी।


इस मामले में पता चला है कि लगभग ६० एकड़ क्षेत्र में ४१ आवासीय और व्यावसायिक इमारतों का अवैध रूप से निर्माण किया गया था। दरअसल, इस भूखंड पर एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और एक कचरा डिपो के लिए आरक्षण था। आरोपियों ने वहाँ अनधिकृत निर्माण करने की साजिश रची। इसके लिए आरोपी बिल्डरों और स्थानीय दलालों ने फ़र्ज़ी अनुमोदन दस्तावेज़ तैयार किए थे। इसके ज़रिए आम नागरिकों का विश्वास जीतकर बड़ी संख्या में फ्लैट बेचे गए। अधिकारी ने बताया कि इससे कई गरीब और निर्दोष नागरिकों को ठगा गया।८ जुलाई, २०२४ को उच्च न्यायालय ने वसई-विरार महानगरपालिका सीमा में ४१ अवैध इमारतों को गिराने का आदेश दिया था। इसके ख़िलाफ़ निवासियों ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद २० फ़रवरी, २०२५ को वसई-विरार महानगरपालिका ने सभी ४१ इमारतों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की। ईडी की जाँच में पता चला कि वसई-विरार महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त, नगर नियोजन उपनिदेशक, कनिष्ठ अभियंता, वास्तुकार, चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) और बिचौलिए संगठित तरीके से अवैध निर्माण में शामिल थे। इसमें तत्कालीन आयुक्त अनिल पवार की अहम भूमिका थी। जाँच के दौरान मिली जानकारी के अनुसार, अनिल पवार की नियुक्ति के बाद, आयुक्त के लिए रिश्वत की राशि २० से २५ रुपये प्रति वर्ग फुट और शहरी नियोजन उपनिदेशक वाई.एस. रेड्डी के लिए १० रुपये प्रति वर्ग फुट तय की गई थी।


