विश्व जल दिवस: जल को बचाने की नहीं, संजोने की जरूरत हैं—भरतकुमार सोलंकी, अर्थशिल्पी।

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मुंबई वार्ता

जब भी जल संरक्षण की बात आती हैं, हम सबसे पहले ‘जल बचाओ’ का नारा लगाने लगते हैं। क्या हमने कभी सोचा हैं कि यह ‘बचत’ की सोच हमें कितनी दूर ले जा पाई है? क्या जल की हर बूंद को बचाने के नाम पर हम केवल अपनी कमी का ऐलान नहीं कर रहे हैं? क्या यह हमारी छोटी सोच का प्रतीक नहीं हैं कि करोड़ों गैलन बरसात का पानी हर साल हमारे सामने से बहकर चला जाता हैं और हम उसे संजोने का कोई ठोस इंतजाम नहीं कर पाते?विकसित देशों ने जल के महत्व को समझते हुए उसे बचाने के बजाय ‘प्रबंधन’ का रास्ता अपनाया। वहाँ जल को संकट नहीं, बल्कि संपदा माना जाता हैं।

जलाशय, डैम, भूमिगत जल संचयन और रिसाइकलिंग की उन्नत तकनीकें उन्हें जल समृद्धि की ओर ले जाती हैं। फिर भारत, जहाँ जल को जीवन कहा गया हैं, क्यों हर साल जल संकट की मार झेलता हैं? क्या यह हमारे लिए शर्म की बात नहीं कि हम बरसात के पानी को यूँ ही बह जाने देते हैं और फिर प्यासे रहते हैं?अगर हम हर साल बरसात के पानी को संजोने की योजना बनाएं, गाँव-शहरों में छोटे-छोटे जलाशय, तालाब और भूमिगत टैंक तैयार करे, तो क्या हमें पानी बचाने की चिंता करनी पड़ेगी? क्या हमें अपनी सोच को ‘बचत’ से ‘निवेश’ की ओर नहीं ले जाना चाहिए? जब कुदरत हमें करोड़ों गैलन पानी देती हैं, तो हम उसका संपूर्ण उपयोग क्यों नहीं करते? क्यों जल संरक्षण की बात करते हुए हम केवल नल बंद करने की सलाह देते हैं? क्यों नहीं हम जल प्रबंधन के दीर्घकालिक समाधानों की बात करते हैं?हम जल को बचाने की कोशिश में अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं, पर क्या यही काफी हैं? क्या हमें जल को बचाने की नहीं, बल्कि उसे सहेजने और संजोने की जरूरत नहीं हैं?

जब बरसात का पानी हमारे खेतों में, हमारे जलाशयों में, हमारी बस्तियों में रुककर सहेजा जाएगा, तब जाकर सही मायने में जल संरक्षण का उद्देश्य पूरा होगा।तो इस विश्व जल दिवस पर सवाल उठाइए—क्या हम जल को बचाकर, उसकी किल्लत का डर दिखाकर सही दिशा में बढ़ रहे हैं, या हमें इसे संजोकर एक नई सोच का निर्माण करने की जरूरत हैं? जल को बचाना नहीं, उसे समृद्ध बनाना ही असल में जल प्रबंधन हैं।क्या हम इस बड़ी सोच को अपनाने के लिए तैयार हैं?

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