व्यक्तित्व के धनी- अरुण शुक्ल

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लेखक/शिवराम शुक्ल/मुंबई वार्ता

साधारण परिवार में जन्म लेकर जब कोई व्यक्ति अपने स्पष्ट लक्ष्य को निर्धरित कर, उसे प्राप्त करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति, विशिष्ट अभिरुचि और कठोर परिश्रम के द्वारा अपने ध्येय की प्राप्ति में सफल होता है,तब उसकी इस महान सफलता में उसके व्यक्तित्व का समालोचन वर्तमान समाज को एवं भावी पीढ़ी को प्रेरणाप्रदायक हुआ करता है।

यद्यपि समाज में ऐसे उदाहरण न्यून ही होते हैं तथापि समाज में कर्मठता और मानव मूल्यों के प्रति आस्था को स्थिर करने में इनका मूल्यवान योगदान होता है।उक्त संदर्भ में मैं एक ऐसे व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल रहा हूं, जो एक अत्यंत साधारण परिवार में जन्म लेकर भी जीवन में कुछ करके समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। वह व्यक्ति थे अरुण शुक्ल।

उन्होंने संघर्ष ही जीवन है। इस सुक्ति को अपने जीवन को मशाल बना ली थी। उनका लक्ष्य था देश और समाज की सेवा। साधनहीनता ने ध्येय प्राप्ति में व्यवधान उत्पन्न किया परंतु कर्मठ अरुण, उसे जबरदस्त चुनौती मानकर अपनी दृढृ इच्छा शक्ति, लगन तथा कठोर परिश्रम के द्वारा सर्वसाधारण के समक्ष ध्येय प्राप्ति का अनूठा उदाहरण विरासत में छोड़ गए। अरुण शुक्ल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके व्यक्तित्व के प्रत्येक क्षेत्र को शब्दसीमा में अवगुफन करना निश्चित रूप से असंभव नहीं तो दुष्कर अवश्य है।

जैसा कि मैनें पूर्व में ही कहा कि उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था उनकी साधनहीनता ने ही उन्हें समाज में समाजवाद व्यक्त करने हेतु प्रेरणा दी। वे देश में करोड़ों लोगों को साधनहीनता एवं अभावों में जीवन यापन करते देखते थे और दूसरी ओर साधन संपन्न लोगों को वैभव में अठखेलियां करते देखते थे। उनका हृदय इस वैषम्य से कराह उठता। लोगों का जीवन स्तर उन्नत करने हेतु वे देश के ग्रामीण अंचलों में जाकर गगनों को कठोर परिथम करने की प्रेरणा देते और स्वयं अपने गांव में परिक्षम करते। वे उचित साधनों से आप आप्त करता जीवन स्तर समुन्नत करने के महात्मा गांधी के पक्षधर थे।

अरुण शुक्ल ने साधन संपन्न घरानों में पहुँचकर, देश को गरीबी एवं भुखमरी का अपनी विशिष्ट शैली में वर्णन करके अमीरों के हृदय में देश के साधन हीन लोगों के प्रति त सद्भावना उत्पन्न कर मदद करने की प्रेरणा देते। भारत गांवों का देश है। यदि देश को वास्तव में उन्नति करना है, तो सर्वप्रथम भारत के गांवों को साधनसंपन्न और समृद्ध बनाना होगा। युवक अरुण का हृदय गांवों में यातायात के साधनों का अभाव, स्वास्थ्य चिकित्सा, शिक्षा तथा जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यक वस्तुओं को दुर्लभता से अतित हो उठता।

एक पारदर्शी पत्रकार- अरुण शुक्ल प्रारंभ में एक व्यवसायी बनना चाहते थे। किंतु देश और समाज को दुरावस्था ने उन्हें देश और समाज की सेवा करने का व्रत अपनाने को बाध्य किया। इसके लिये उन्होंने एक पत्रकार के कर्तव्यों को आत्मसात किया। पत्रकार का हृदय संवेदनशील होता है। आधुनिक युग प्रजातंत्र शासन प्रणाली का युग है। पत्रकार समाज और शासन के मध्य एक कड़ी के रूप में होता है। वह प्रजातंत्र का सजग प्रहरी एवं रक्षक होता है। समाज में व्याप्त अंधविश्वासों तथा कुरोतियों के मोह से जनता की दूरकर, वैज्ञानिक तथ्यों की और उन्मुख करता है।

अरुण शुक्ल ने एक संवेदनशील, निर्भीक, कर्तव्य परायण, प्रगतिशील, पारदर्शी और प्रजाातंत्र-रक्षक पत्रकार के रूप में ख्याति प्राप्त की थी। उन्होंने पुलिस-व्यवस्था एवं पुलिस कार्यवाही तथा प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर के राजनेताओं पर निर्भीकता एवं जुझारूपन के द्योतक लेख प्रकाशित किये। सामाजिक तथा आर्थिक शोषण एवं अत्याचार के विरुद्ध खुलकर अपनी अभिव्यक्ति देते थे। मजदूर किसानों की समस्याओं के प्रति शासन तंत्र को अपने लेखों के माध्यम से सचेत करने तथा इसी तरह के अन्य लोकहितकारी मुद्दों के समाधान के लिये समाज और शासन को विवश करते रहते।

समाज में अपने असमाजिक तत्वों एवं रूढ़ीजन्य दुष्परिणामों से जनता को सजग करने में उन्हें कभी-कभी जनता का ही कोपभाजन बनना पड़ता था। परन्तु वे एक पत्रकार के रूप में कदापि विचलित नहीं हुए। वेे शासनतंत्र में व्याप्त नौकरशाही को प्रजातंत्र का निर्वेदिक मानते थे। वे उसके निदान स्वरूप जनता और शासन की रूप में एक निस्प्रह तथा जागरूक पत्रकार को ही महत्व देते थे। भारत के ग्रामीण अंचलों में दूरसंचार और अन्य प्रचार-प्रसार के माध्यमों का विकास नगन्य हैं। इस तथ्य को हृदयंगम करके हीं है पत्रकार अरुण ने देहातों की सगर याओ एवं अभावों को शासन के सूत्रधरों के सम्मुन प्रस्तुतकर ग्रामीण अंचलों में विकासक्रम प्रारंभ करने को बाध्य करते थे।

उनमें स्पष्टवादी और पारदर्शी आदर्श पत्रकार के समस्त गुण विद्यमान थे।भारतीय संस्कृति के पोषक – विश्व को अनेक संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति एक अक्षयवट की भाँति अक्षुण्य है। भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी और सहनशीलता की शक्ति के अरुण शुक्ल उन्मुक्त प्रशंसक थे। वे अपने परिवार में भी भारतीय मर्यादाओं एवं स्वस्थ रीति-रिवाजों को कार्यान्वित करते थे। पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अंध समर्थकों के वे प्रबल विरोधी थे। वे बाहरी ज्ञान और तकनीक को भारतीय परिवेश में ग्रहण करने के पोषक थे। युवक अरुण प्राचीन भारत पर आस्थावान थे एवं गौरव अनुभव करते थे।

मानव की प्रत्येक शक्ति संवर्धित हो सकती है और वह संस्कार- संपन्न भी हो सकती है। इस शक्ति संवर्धन से और संस्कार संपन्नता से मानव का अतिमानव बनना, यह संस्कृति का ध्येय है। भारतीय संस्कृति में यह सामर्थ्य है, तभी तो अरुण शुक्ल भारतीय संस्कृति से संस्कारित थे।प्रेरणास्पद युवक अरुण शुक्ल का सुगठित, सुडौल और आकर्षक चेहरा तथा शरीर युवकों के लिए प्रेरणास्त्रोत था। युवक में परिक्षमजन्य साधन संपन्नता एवं उर्जा हो समाज में उसे शक्ति पुंज का पर्याय माना जाता है और उसमें अमंभन कार्यों को भी संभव करने की अपेक्षा की जाती है। युवक-अरुण के मस्तिष्क में असंभव शब्द के लिये कोई स्थान नहीं था।

मैंने देखा था कि महाविद्यालय छात्रसंघ और अध्यक्ष तथा अन्यान्य युवक उनसे परामर्श व सुझाव प्राप्त करने उनका मुँह ताकते थे। वे युवा-शक्ति के अप्रतिम पारखी थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में युवा-शक्ति के प्रबल स्तंभ नेहरू और सुभाषचंद बोस के रूप में युवा-शक्ति को भली-भाँति पढ़ा था। तभी तो वे भारतीय युवकों को भारत के दैन्य को दूर करने हेतु जुटने का आव्हान करते थे।

■ निराभिमान सच्चे मददगार

‘परोपकारार्थ इदम शरोरं, अरुण इस सुक्ति को जीवनपर्यंत इसे एक मंत्र मानकर परोपकार करते रहे। परोपकार ही स’चा धर्म है। नगर का हो चाहे देहात का, परिचित हो अथवा अपरिचित, जो भी व्यक्ति उनके समीप आता ते आत्मीयता से उसकी बात सुन, उसे धैर्य बंधाते तथा उसकी अपने हर संभव साधनों के द्वारा मदद करने हेतु तत्पर रहते। दीन- हीनों की मदद करने में उन्हें विशेष सुख और संतोष प्राप्त होता था।समस्त गुणों से अलंकृत होते हुए भी वे नितांत निराभिमानी व्यक्ति थे। अपने से बड़ी तथा पूज्य लोगों के सम्मुख वे सदैव नतमस्तक रहते और मर्यादाओं तथा शिष्टाचारों का निर्वाह करने में ने कभी त्रुटि नहीं करते थे।

अरुण शुक्ल भौतिक शरीर से इस संसार में नहीं हैं, किंतु उनका यश: शरीर अधवधि अमर है। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व तथा उसे इस लघुकाय लेख में आवद्ध करना कठिन है। उनके व्यक्तित्व की कदाचित क्षणिकाओं एवं कणिकाओं से यदि हमने स्वल्प प्रेरणा ग्रहण की तो निश्चित ही उनका पुण्य-स्मरण सार्थक होगा। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि ऐसे व्यक्तियों का इस देश में पुन: पुन: आविर्भाव हो।स्थान- छपरा (सिहोरा)तिथि- मकरसंकांति1 जनवरी 1998

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