
कांदिवली (पूर्व) स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मैदान में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञानयज्ञ के चतुर्थ दिवस में आध्यात्मिक उत्साह चरम पर रहा। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी महाराज के दिव्य एवं प्रभावशाली प्रवचनों ने हजारों श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, जीवन-शोधन और धर्म की सार्थक परिणति की ओर प्रेरित किया। इस पावन अवसर पर उपस्थित जनसमुदाय मंत्रमुग्ध होकर ज्ञानगंगा में स्नान करता रहा, वहीं गीता-ज्ञान की पावन वर्षा ने वातावरण को जीवंत और धारदार बना दिया।


स्वामी जी ने आज के सामाजिक परिवेश, बढ़ते तनाव, परिवारिक विघटन, मानसिक अवसाद तथा भौतिकता की अंधी दौड़ का उल्लेख करते हुए कहा कि “आज मनुष्य के पास सुविधाएँ हैं, परंतु सुख नहीं; साधन हैं, पर साधना नहीं; उपलब्धियाँ हैं, पर आत्मशांति का अभाव है।” ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता मानवता के लिए संजीवनी है — जो भटके मन को दिशा देती है और जीवन को संतुलन प्रदान करती है।


उन्होंने कहा कि “श्रीमद्भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, जीवन का उपयोगी मार्गदर्शक है।”गीता विवेक, संयम, साहस और करुणा का शास्त्र है — संघर्ष में धैर्य देती है और निराशा में प्रकाश।महाराज जी ने अपने प्रवचन में कहा—> “गीता विश्व-धर्म की पुस्तक है, केवल हिंदू धर्म की नहीं। यह मानवता का संविधान है, जो हर युग में मार्गदर्शन करता है।”उन्होंने संदर्भ देते हुए श्लोक उद्धृत किया—“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”अर्थ : इस संसार में ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र वस्तु नहीं।आगे स्वामी जी बोले—“गीता व्यवहार का धर्म है, वाद-विवाद का नहीं। जिस दिन गीता का सार जीवन में उतर जाए, उसी दिन समस्त शास्त्र स्वयं स्पष्ट हो जाते हैं।”और इसी भाव को श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया—“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब युवा दिशाहीनता, तनाव और प्रतिस्पर्धा में उलझा है— उस समय गीता की एक-एक पंक्ति दीपक बनकर मार्ग दिखाती है। यदि घर-घर में गीता का पाठ प्रारंभ हो जाए तो सामाजिक तनाव, वैचारिक विभाजन और मूल्यहीनता स्वतः कम होने लगे।कार्यक्रम संयोजक मंडल ने बताया कि ज्ञानयज्ञ में प्रतिदिन अधिक संख्या में श्रद्धालु पहुँच रहे हैं और परिसर में शांति, अनुशासन एवं भक्ति की अनूठी धारा प्रवाहित है।
इस भव्य आयोजन में एडवोकेट जे. डी. सिंह, श्री राम मणि मिश्र, श्री ओम प्रकाश सिंह, श्री हरिश्चंद्र शुक्ल, प्रमोद दुबे, डॉ. दिनकर दुबे, संचित यादव, अनिल पांडेय, सूरज प्रताप सिंह देवड़ा सहित अनेक कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।अंत में स्वामी जी ने सभी से आग्रह किया कि “नये वर्ष का संकल्प केवल लक्ष्यों का न हो, चरित्र और चित्त-शुद्धि का भी हो। गीता को पढ़ें, जीएँ और बच्चों को भी उससे जोड़ें। यही मानवता की पुनर्स्थापना का मार्ग है।”


