हिंदी भारत के माथे की बिंदी।

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एडवोकेट विनोद पाठक/मुंबई वार्ता

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक अच्छा निर्णय लिया था कक्षा पहली से कक्षा पांचवी तक हिंदी को अनिवार्य करने का। उनके निर्णय का महाराष्ट्र सहित देश के सभी लोगों ने खुलकर स्वागत किया था। कुछ लोगों ने इस निर्णय का विरोध भी किया अपने वोट बैंक के लालच में। दुख का विषय है की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने हिंदी के अनिवार्य करने के निर्णय को वापस ले लिया।

यदि यह निर्णय वापस ही लेना था तो अनिवार्य करने का निर्णय क्यों लिया गया? देश की आजादी के लिए यदि किसी भाषा ने प्रखर रूप से देश के लोगों को एकजुट किया है तो वह सिर्फ और सिर्फ हिंदी है।

महात्मा गांधी ने भी जिन्हें हम राष्ट्रपिता मानते हैं प्रमाणिक तौर पर कहा था की हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक के लोगों को जोड़ने के लिए रोजी-रोटी की भाषा के रूप में आगे बढ़ाया जाए। हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस भी क्यों मनाते हैं क्योंकि हिंदी हमारे देश के माथे की बिंदी है हमारा गौरव है हमारा मान सम्मान है हमारी आत्मा है हमारी संस्कृति है।

मुझे दुख इस बात का हो रहा है मुंबई में उत्तर भारतीय संघ सहित दर्जनों संगठन है जो अपने आंखों और मुंह पर गांधारी पट्टी बांधे मुक दर्शक बनकर किसी बिल में छिपे हुए हैं। प्रमाणिक सत्य है कि हिंदी भाषी मुंबई में डॉक्टर राम मनोहर त्रिपाठी जैसा प्रखर राजनेता हमारे पास नहीं है। बाबूजी होते तो अभी तक उनकी लेखनी प्रखर रूप से चलती और वह सभी को एकजुट कर मुख्यमंत्री से मिलते और हिंदी को मान सम्मान दिलाने के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा देते।

आगामी नवंबर में महानगरपालिका चुनाव होने वाला है लोग अपनी अपनी डफली बजाने के लिए अपना अपना प्रयत्न करेंगे। हिंदी हमारी गौरव है हमारी राष्ट्रभाषा हैमुख्यमंत्री जी आपके पास समय है एक बार पुनः समय है हिंदी के सम्मान में खड़े होने का।

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