2011 मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट केस: लंबी हिरासत और धीमी सुनवाई के आधार पर दो आरोपियों को जमानत।

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मुंबई वार्ता संवाददाता


मुंबई में वर्ष 2011 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में विशेष मकोका (MCOCA) अदालत ने शुक्रवार को दो आरोपियों को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि लंबी अवधि से जेल में बंद रहने और मुकदमे की धीमी प्रगति को देखते हुए इस स्तर पर जमानत उचित है। जमानत पाने वाले आरोपियों में नकी अहमद वासी अहमद शेख और हारून राशिद अब्दुल हमीद नाइक शामिल हैं।


यह मामला 13 जुलाई 2011 को शाम के व्यस्त समय में हुए तीन धमाकों से जुड़ा है। ये विस्फोट ओपेरा हाउस, जवेरी बाजार और दादर में हुए थे, जिनमें 27 लोगों की मौत हुई थी और 127 लोग घायल हुए थे।

■ जांच और मुकदमे में देरी


इस मामले में दर्ज तीन अलग-अलग एफआईआर को बाद में एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) को सौंप दिया गया था और 2012 में एक संयुक्त चार्जशीट दाखिल की गई। महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत मामला दर्ज किया गया था।


दिसंबर 2011 में बिहार के दरभंगा जिले से जुड़े संदिग्ध युवकों के बारे में मिली जानकारी के बाद जांच का दायरा बढ़ा। जनवरी से मई 2012 के बीच कई गिरफ्तारियां हुईं और कथित आतंकी साजिश का खुलासा हुआ। जमानत पाने वाले आरोपी तब से हिरासत में थे।


हालांकि, करीब एक दर्जन आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने में ही सितंबर 2019 तक का समय लग गया। इसके बाद भी सुनवाई धीमी रही—अब तक 200 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं, जबकि 100 से अधिक गवाहों की गवाही अभी बाकी है। अदालत ने माना कि मुकदमा पूरा होने में अभी काफी समय लगेगा।

■ अदालत की टिप्पणी


विशेष न्यायाधीश सत्यनारायण आर. नवनदर ने कहा कि जमानत याचिकाएं मुख्य रूप से लंबी हिरासत के आधार पर दायर की गई थीं, न कि मामले के गुण-दोष के आधार पर। इसलिए अदालत ने सिर्फ इसी पहलू पर विचार किया।


अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए अपराध की गंभीरता, सीसीटीवी फुटेज, वैज्ञानिक साक्ष्य और स्वीकारोक्ति बयान का हवाला दिया। साथ ही कहा कि ऐसे मामलों में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकती।
लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का पालन ट्रायल कोर्ट भी करने के लिए बाध्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों को त्वरित सुनवाई का अधिकार है और इसे केवल औपचारिक रूप से नहीं बल्कि वास्तविक रूप में लागू किया जाना चाहिए।

■ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला


अदालत ने पहले इसी मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा एक सह-आरोपी को दी गई जमानत का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी कुछ परिस्थितियों में कड़े कानूनी प्रावधानों पर भारी पड़ सकती है।


साथ ही सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब’ मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि मुकदमा उचित समय में पूरा होने की संभावना नहीं है, तो लगातार हिरासत संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकती है।


इन्हीं आधारों पर समानता (पैरिटी) के सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने दोनों आरोपियों को जमानत देने का आदेश दिया, हालांकि साक्ष्यों या दोष तय करने पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।

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