2018 के संविधान से शिवसेना की शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हुईं: सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल की दलील।

Date:

मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय

शिवसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पार्टी के इतिहास, संविधान और आंतरिक संगठनात्मक ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य रखे। उन्होंने दलील दी कि 2018 में शिवसेना के संविधान में किए गए बदलावों से पार्टी की शक्तियां बड़े पैमाने पर पार्टी प्रमुख के हाथों में केंद्रित हो गई थीं, जबकि 1999 में चुनाव आयोग के समक्ष स्वीकार किए गए संविधान में निर्वाचित संस्थाओं और पदाधिकारियों को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी।


कौल ने कहा कि उद्धव ठाकरे गुट जिस पार्टी संविधान का हवाला दे रहा है, वह उस लोकतांत्रिक संगठनात्मक व्यवस्था से अलग है, जिसे शिवसेना ने पहले चुनाव आयोग के समक्ष स्वीकार किया था।

■ 43 में से 42 दलों ने कराए थे संगठनात्मक चुनाव


कौल ने चुनाव आयोग के 1997 के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि आयोग ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र बनाए रखने और समय-समय पर संगठनात्मक चुनाव कराने पर जोर दिया था। उस समय 43 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों में से 42 दलों ने संगठनात्मक चुनाव कराए थे, जबकि शिवसेना अकेली ऐसी पार्टी थी, जिसने कहा था कि उसके संविधान में संगठनात्मक चुनाव का प्रावधान नहीं है और पदाधिकारियों का मनोनयन किया जाता है।


चुनाव आयोग ने इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया और राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक संगठनात्मक व्यवस्था अपनाने पर जोर दिया।

■ 1997 में चुनाव, 1999 में संविधान में बदलाव


कौल के अनुसार, चुनाव आयोग की आपत्तियों के बाद शिवसेना ने दिसंबर 1997 में संगठनात्मक चुनाव कराए। इन चुनावों में पांच वर्ष के लिए 14 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी चुनी गई। साथ ही पार्टी के संविधान में संशोधन और आंतरिक चुनावों के नियम तय करने के लिए तीन सदस्यीय समिति भी गठित की गई।


इसके बाद 1999 में शिवसेना के संविधान में संशोधन किया गया और पार्टी के भीतर निर्वाचित पदों एवं संस्थाओं को अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया।
कौल ने इस घटनाक्रम के आधार पर कहा कि बालासाहेब ठाकरे ने चुनाव आयोग की आपत्तियों को खारिज करने के बजाय संगठनात्मक लोकतंत्र की प्रक्रिया को स्वीकार किया था।

■ 2018 में फिर बढ़ा पार्टी प्रमुख का अधिकार


सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए कौल ने कहा कि 2018 में पार्टी के संविधान में किए गए बदलावों ने पहले से स्थापित लोकतांत्रिक ढांचे को काफी हद तक बदल दिया। 1999 के संविधान में प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रीय कार्यकारिणी जैसी संस्थाओं को जिम्मेदारियां दी गई थीं, जबकि 2018 के बदलावों के बाद पार्टी प्रमुख के पास व्यापक अधिकार केंद्रित हो गए।


कौल के अनुसार, चुनाव आयोग ने बाद में 2018 के इस ढांचे को पार्टी प्रमुख के आसपास बने ‘पावर सेंटर’ के तौर पर देखा और उसके लोकतांत्रिक स्वरूप पर सवाल उठाए।

■ सिर्फ संविधान में ‘लोकतांत्रिक’ लिखना पर्याप्त नहीं


कौल ने जोर दिया कि किसी राजनीतिक दल के संविधान में केवल लोकतांत्रिक शब्द लिखे होने से वह व्यवस्था वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हो जाती। इसके लिए पार्टी के भीतर अधिकारों का विभाजन, निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका और समय-समय पर होने वाले संगठनात्मक चुनाव भी जरूरी हैं।


उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक दल के संविधान में ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं, जिनके जरिए पार्टी की लगभग सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो जाएं और फिर उसी संशोधित संविधान को संगठन की वैधता का आधार बनाया जाए।

■ ‘चुनाव आयोग ने रातों-रात फैसला नहीं लिया’


कौल ने यह धारणा भी खारिज की कि चुनाव आयोग ने अचानक या जल्दबाजी में कोई फैसला लिया। उन्होंने कहा कि शिवसेना के आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा वर्षों पुराना है। 1997 में ही आयोग ने पार्टी के प्रतिनिधियों से बातचीत की, नोटिस जारी किए, पार्टी का पक्ष सुना और संगठनात्मक चुनाव कराने की दिशा में कदम उठाने को कहा था।


इसलिए मौजूदा विवाद को केवल 2022 के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद लिया गया कोई अचानक फैसला नहीं माना जा सकता। इसके पीछे शिवसेना के संगठनात्मक और संवैधानिक इतिहास की लंबी प्रक्रिया है।
मामला सिर्फ चुनाव चिह्न का नहीं, पार्टी की पहचान और अधिकार का है
शिवसेना की ओर से दलील दी गई कि मौजूदा विवाद केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि किस गुट ने कौन-सा पत्र या दस्तावेज पेश किया। मूल प्रश्न यह है कि राजनीतिक पार्टी की पहचान, उसके संविधान, संगठनात्मक ढांचे और पदाधिकारियों को तय करने का अधिकार किसके पास है।


कौल ने कहा कि यदि किसी संविधान में निर्वाचित संस्थाओं को भी एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर कर दिया जाए, तो केवल उन संस्थाओं के अस्तित्व से वास्तविक आंतरिक लोकतंत्र साबित नहीं होता।

■ राजनीतिक दलों में भी आंतरिक लोकतंत्र जरूरी


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह भी दलील रखी गई कि लोकतंत्र केवल लोकसभा या विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं है। राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चयन करते हैं, सरकार बनाने में भूमिका निभाते हैं और जनप्रतिनिधियों को तैयार करते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के भीतर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था और संगठनात्मक चुनाव होना जरूरी है।


शिवसेना की ओर से पेश किए गए ऐतिहासिक घटनाक्रम के अनुसार, 1997 में चुनाव आयोग ने आंतरिक लोकतंत्र पर जोर दिया, दिसंबर 1997 में संगठनात्मक चुनाव हुए, 1999 में पार्टी संविधान में संशोधन कर लोकतांत्रिक संगठनात्मक ढांचा बनाया गया और 2018 में संविधान में व्यापक बदलाव कर पार्टी प्रमुख के अधिकारों को बढ़ाया गया।


शिवसेना का तर्क है कि इसी ऐतिहासिक क्रम को देखते हुए यह तय करना महत्वपूर्ण है कि पार्टी की वैध संगठनात्मक पहचान किस संविधान और किस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए।

■ 15 सितंबर को अगली सुनवाई


इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को होगी। उस दौरान शिवसेना की ओर से अपनी आगे की दलीलें और भूमिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी जाएगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

प्रमुख खबरे

More like this
Related