14 सितंबर , 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। यह निर्णय लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण था, जहां भाषा की विविधता के बावजूद एक ऐसी भाषा को राजभाषा चुना गया, जो देश के अधिकांश लोगों के लिए सहज और सुलभ हो। तब से हिंदी ने अनेक परिवर्तन देखे है उसके बावजूद देश की प्रमुख भाषाओं में से एक बनी हुई है! यह वह भाषा है, जिसने देश की आत्मा को प्रतिबिंबित किया है और स्वतंत्रता के बाद भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया है। तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति के साथ हिंदी ने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक पुल का काम किया है। आज हिंदी न केवल भारत, बल्कि कई देशों में भी पढ़ाई और बोली जाती है पिछले वर्षों में हिंदी को राजभाषा के रूप में पूरी तरह स्थापित करने में सबसे बड़ी चुनौती भाषाई विविधता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में जहां विभिन्न राज्यों की अपनी-अपनी भाषाएं हैं, वहां एक भाषा को पूरे देश में लागू करना जटिल कार्य है, किंतु आज के समय में डिजिटल क्रांति के साथ हिंदी को एक नया मंच मिला है। इंटरनेट ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया है।तकनीकी क्षेत्र में भी हिंदी का उपयोग बढ़ रहा है।
75 वर्षों में हिंदी को कानून की भाषा बनाना महत्वपूर्ण लेकिन चुनौतीपूर्ण प्रश्न रहा है। इसके लिए संवैधानिक, कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बदलाव की आवश्यकता होगी। यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं तो यह भारतीय न्यायिक प्रणाली को अधिक सुलभ – और पारदर्शी बना सकता है। इससे न केवल हिंदी भाषी जनता को लाभ होगा, बल्कि यह लोकतंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। वर्तमान में अधिकांश कानूनी पाठ्यक्रम और पुस्तकों का माध्यम अंग्रेजी है। हिंदी में कानूनी साहित्य, पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विकास करना होगा। इसके साथ ही वकीलों, न्यायाधीशों और को हिंदी में दक्षता प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण लेना होगा।
भाषा का महत्व आज अत्यधिक बढ़ गया है। ज्ञान का सृजन और प्रसार विज्ञान और तकनीक के माध्यम से हो रहा है। इन दोनों ही क्षेत्रों में अंग्रेजी का वर्चस्व है। भारत जैसे बहुभाषी देश में जब एक बड़ी जनसंख्या हिंदी में संवाद करती है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि विज्ञान और तकनीक से संबंधित ज्ञान भी इसी भाषा में उपलब्ध हो। हिंदी को विज्ञान की समृद्ध भाषा बनाना आवश्यक है, क्योंकि यह समाज के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है। इससे न केवल भाषा का विकास होगा, बल्कि आम जनता को विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। डिजिटल मीडिया के माध्यम से हिंदी में वैज्ञानिक और तकनीकी सामग्री को व्यापक रूप से प्रसारित किया जा सकता है। अनुवाद साॅफ्टवेयर तकनीक भी इस दिशा में मददगार साबित हो रहे हैं। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से भाषाई बाधाओं को दूर किया जा सकता है और जटिल सामग्री को हिंदी में सुलभ किया जा सकता है।
विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है। नेपाल, फिजी, मारीशस, गुयाना और त्रिनिदाद आदि देशों में भी इसका प्रयोग होता है। हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए भारत को अन्य देशों से सहयोग और समर्थन प्राप्त करना होगा, विशेषकर उन देशों से जहां हिंदी का उपयोग होता है। हाल के वर्षों में भारत सरकार ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री
मोदी और विदेश मंत्रालय ने कई बार इस मुद्दे को उठाया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए भारत को अत्यधिक प्रयास करने होंगे। इसके लिए वित्तीय सहयोग के साथ-अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी आवश्यक है ।अगर भारत वैश्विक शक्तियों का समर्थन जुटा पाने में सफल हो पाता है तो संभव है हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा में स्थान मिल सके।
नन्दिनी रस्तोगी ‘नेहा’ मेरठ


