इजरायल-ईरान युद्ध और भारत।

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ज्ञानेंद्र मिश्र /स्तंभकार/मुंबई

● विषय परिचय

पिछले सप्ताह तेहरान में अचानक हुए बम विस्फोटों ने विश्व समुदाय को स्तब्ध कर दिया। ईरान के प्रमुख परमाणु अनुसंधान केंद्रों पर हुए इन हमलों ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। यह हमला इजरायल द्वारा बिना किसी पूर्व चेतावनी के किया गया, जिसने ईरान के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया।

■ इजरायल की रणनीति

इन हमलों की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहली ही रात में ईरान के कई उच्च पदस्थ अधिकारी और शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मारे गए। कहा जाता है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई भी इस हमले के निशाने पर थे, लेकिन अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण उनकी जान बख्श दी गई।

■ ईरान के साथ युद्ध करने की वजह

इजरायल ने ईरान के खिलाफ सीधे युद्ध छेड़ने का साहसिक निर्णय लिया, जबकि वह पिछले वर्ष से गाजा में युद्ध में उलझा हुआ है और अपने पड़ोसी शत्रु देशों के हमलों का सामना कर रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इजरायल को अपने अस्तित्व पर बढ़ते खतरे का आभास हुआ। यदि ईरान किसी भी प्रकार से परमाणु बम बनाने में सफल हो जाता है तो निश्चित तौर पर वह आतंकवादी संगठनों को यह टेक्नोलॉजी यह बम हस्तांतरित करेगा कारण कि ये उसकी घोषित नीति है कि इसराइल को पूरी तरह से समाप्त कर देना और इन आतंकवादी संगठनों की नीति है सभी गैर मुसलमानों को खास तौर हिंदुओं को समाप्त कर देना चाहिए। अतः यह युद्ध मात्र इजरायल ही नहीं दुनिया के तमाम राष्ट्र लड़ रहे हैं बस इजरायल उन सभी का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

■ अमेरिका की भूमिका

अमेरिका ने इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया, लेकिन उसने अपनी स्थिति को स्पष्ट रूप से तटस्थ रखा। विश्व समुदाय को यह संकेत नहीं दिया गया कि अमेरिका ने इस हमले में कोई भूमिका निभाई।

■ इजरायल की समानांतर रणनीति

पिछले वर्ष से गाजा में युद्ध के साथ-साथ इजरायल ने ईरान के प्रॉक्सी आतंकवादी संगठनों, जैसे सीरिया, लेबनान के हिजबुल्लाह, और यमन के हूती विद्रोहियों को कमजोर करने की रणनीति अपनाई। इन संगठनों को एक-एक करके निशाना बनाकर इजरायल ने ईरान की ताकत को अप्रत्यक्ष रूप से कम किया।

■ हमलों की तकनीकी जटिलता

इजरायल के हमले 2000 से 2500 किलोमीटर की दूरी से किए गए, जिसके लिए उन्नत सैन्य तकनीक और समन्वय की आवश्यकता थी। इस तरह के ऑपरेशन के लिए हवाई ईंधन टैंकरों और अन्य सहायता की जरूरत पड़ती है। निश्चित तौर पर बहुत से राष्ट्रों ने इजरायल की मदद की है उन्हें अपने एयर स्पेस को इस्तेमाल करने की इजाजत के साथ-साथ हवाई ईंधन टैंकर भी ईरान प्रवेश के पहले उपलब्ध कराया है इसराइल के युद्धक विमानों को। मगर कोई भी राष्ट्र खुलकर ईरान के सामने या इस युद्ध में शामिल नहीं हो रहा है इससे ईरान के लिए किसी अन्य राष्ट्र के एसेट पर आक्रमण करने संभव हो नहीं रहा। अमेरिका ने हालांकि खुलकर कहा है कि वह सत्ता परिवर्तन के लक्ष्य से काम नहीं कर रहा वरन् वह ईरान का संपूर्ण आत्मसमर्पण, अपमानजनक आत्मसमर्पण चाहता है ताकि भविष्य में कोई भी इस्लामी राष्ट्र, इस्लामी शासन परमाणु बम की तरफ सोचने के पहले कम से कम 10 बार सोचे।

■ ईरान की क्षमता

वैसे ईरान की क्षमता को कमतर आंकने की आवश्यकता नहीं है। ईरान अभी भी लगातार इसराइल के ऊपर मिसाइल छोड़ रहा है और छात्र प्रतिशत मिसाइल रोधी क्षमता की बात करने वाला इसराइल कई सारे मिसाइल को रोक नहीं पाया है। अतः इसराइल को और भी सतर्क रहने की आवश्यकता है। हालांकि इजराइल में ईरान में लोग तेहरान छोड़कर भाग रहे हैं और जिस प्रकार से अमेरिकी राष्ट्रपति ने तेहरान खाली करने के हिदायत दी है चेतावनी दी है उससे यह लगता है कि ईरान को एक निश्चित नतीजे तक पहुंच कर ही दम लेंगे अमेरिका और इजरायल।

■ वैश्विक आतंकवाद और ईरान की भूमिका

वैश्विक स्तर पर इस्लामी आतंकवाद के संदर्भ में ईरान को एक प्रमुख प्रायोजक माना जाता है। इजरायल की रणनीति इस्लामी आतंकवाद की जड़ पर प्रहार करने की रही है। पहले उसने ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को कमजोर किया, और फिर सीधे ईरान पर हमला बोला। आतंकवादी संगठनों को खुलकर सहयोग देता रहा है ईरान और वैश्विक आतंकवाद की जड़ ईरान से ही निकलती दिखाई प्रतीत होती है। फिलिस्तीनी हमास, सीरिया, हसबोल्ला, हूती- इन सभी आतंकवादी संगठन को खाद पानी ईरान से ही प्राप्त होता है। दुनिया के ईंधन व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा तकरीबन 20% लाल सागर से होकर गुजरता है जो इन्हीं आतंकवादी संगठनों, खासतौर से हूती और हसबुल्ला द्वारा प्रभावित किया जा सकता है, अक्सर किया जाता रहा है जिसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय ईंधन मात्रा पर ही नहीं तकरीबन सभी कंज्यूमर गुड्स पर पड़ता है क्योंकि बहुत सारे जहाज को लाल सागर छोड़कर घूम कर जाना होता है दूरी बढ़ती है ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट पड़ता है और सामानों के मूल्य में वृद्धि होती है अतः यह युद्ध लंबा नहीं चलाया जा सकता।

■ जी7 सम्मेलन और अमेरिका का संदेश

जी7 सम्मेलन से अमेरिका का बीच में लौटना एक स्पष्ट संदेश था कि वह युद्ध क्षेत्र से दूर नहीं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनापेक्षित कार्यशैली भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। अतः यह अच्छा ही हुआ कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात ना हो सकी और डोनाल्ड ट्रंप को बैठक बीच में ही छोड़कर अमेरिका वापस जाना पड़ा।

■ भारत की स्थिति और कूटनीति

भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक रूप से जटिल है। इजरायल भारत के साथ आत्मीय संबंध है और भारत का स्वाभाविक मित्र है, क्योंकि दोनों देश समान शत्रु-इस्लामी आतंकवाद- का सामना करते हैं। जबकि ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध हैं जो आपसी लाभ के दृष्टिकोण पर आधारित हैं। अतः भारत को बहुत ही सावधानी से अंतर्राष्ट्रीय को कूटनीति के मार्ग पर चलना होगा और इंतजार करना होगा कि इस युद्ध का परिणाम क्या निकलता है। भारत किसी भी परिस्थिति में युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हो सकता हालांकि परोक्ष रूप से उसे इजरायल की मदद करनी चाहिए क्योंकि ईरान की चीन, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ नजदीकियां भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है। हालांकि इस परिस्थिति में ना तो पाकिस्तान ना तो तुर्की या कोई अन्य इस्लामी राष्ट्र भी ईरान का साथ खुलकर नहीं दे पा रहे हैं-कोई भी इसराइल के क्रोध और इच्छा शक्ति का सामना करने की ताकत नहीं रखता और अमेरिका के साथ अपने तालुकात खराब करना बर्दाश्त नही‌कर सकता।

■ भारत की आंतरिक चुनौतियां

भारत की सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक है। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और भारत के हितों के खिलाफ मत रखने वाले समूह, विशेष रूप से घुसपैठिए और उनके समर्थक, भारत की प्रगति में बाधा डाल रहे हैं।

■ आंतरिक चुनौतियों के लिए प्रस्तावित समाधान

इन समस्याओं से निपटने के लिए भारत को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

कड़े प्रावधानों के साथ एक #जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू किया जाए, जिसमें उल्लंघन करने वालों को सामाजिक सुविधाओं और मताधिकार से वंचित किया जाए तथा साथ ही नवजात बच्चे को भी सामाजिक सुविधाओं से वंचित करते हुए भविष्य में मताधिकार से वंचित रखा जाए।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के साथ कड़ाई से लागू किया जाए।

घुसपैठियों के सहायकों को देशद्रोह के आरोप में दंडित किया जाए, जिसमें कम से कम 10 वर्ष की सश्रम कारावास या फांसी का प्रावधान हो।

भारत विरोधी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले मुसलमानों‌व तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी देशद्रोह के दायरे में लाकर सजा दी जाए, संभव हो तो देशद्रोह के‌ ऐसे अपराधियों को फांसी की सजा दी जाए।

■ निष्कर्ष

इजरायल-ईरान युद्ध भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक परीक्षा की घड़ी है। भारत को एक-एक कदम बहुत ही फूंक फूंक कर रखना होगा। आंतरिक समस्याओं से निपटना भारत की प्राथमिकता है परंतु भारत को इजरायल से प्रेरणा लेकर अपनी सुरक्षा, संस्कृति, और आस्तित्व की रक्षा के लिए साहसिक कदम उठाने होंगे। आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए कड़े कानून और रणनीतिक नीतियां आवश्यक हैं।भारत को अपनी कूटनीति को मजबूत करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति को सशक्त करना होगा।

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