मुंबई वार्ता संवाददाता

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया बजट पिछले बजट से किसी भी तरह अलग नहीं है। यह बजट किसी भी समाज वर्ग को संतुष्ट करने वाला नहीं है, बल्कि केवल बड़े-बड़े आंकड़ों और दावों तक सीमित है। बजट में आंकड़ों की जुमलेबाजी की गई है और यह पूरी तरह दिशाहीन है, ऐसी तीखी आलोचना महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने की।


देश में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए ठोस नीति की आवश्यकता है, लेकिन इस बजट में रोजगार सृजन को लेकर कोई स्पष्ट दिशा नजर नहीं आती। किसानों के हित में कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया है। आयकर देने वाले नौकरीपेशा वर्ग और मध्यम वर्ग को भी कोई राहत नहीं दी गई है। घोषित विकास दर के लक्ष्यों को हासिल करना भी कठिन प्रतीत होता है और केंद्र सरकार का यह बजट केवल घोषणाओं तक सीमित है, ऐसा सपकाल ने कहा।


बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण देश के लघु, मध्यम और छोटे उद्योग पूरी तरह से कमजोर हो चुके हैं। इस क्षेत्र को अब तक कोई ठोस उभार नहीं मिला है और इस बजट से भी इन्हें कोई ठोस समर्थन नहीं मिला। देश में सबसे अधिक रोजगार सृजन इसी क्षेत्र से होता है, लेकिन सरकार ने इस सच्चाई की पूरी तरह अनदेखी की है। मोदी सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी बड़े पैमाने पर बढ़ी है और ताजा आंकड़ों के अनुसार दो स्नातकों में से एक बेरोजगार है, यानी बेरोजगारी 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। निवेश और रोजगार सृजन के मामले में मोदी सरकार पूरी तरह विफल रही है, ऐसा भी उन्होंने कहा।
भारत एक कृषि प्रधान देश है, फिर भी इस बजट ने किसानों को घोर निराश किया है। किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पिछले 12 वर्षों में पूरा नहीं हुआ है। इसके उलट खेती की लागत दोगुनी हो गई है, कृषि उपज को उचित दाम नहीं मिल रहे हैं, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा रहा है और किसानों की आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं। इन गंभीर मुद्दों पर बजट में कोई ठोस प्रावधान नहीं है। सालाना 6 हजार रुपये देकर किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, यह सरकार को समझना चाहिए, ऐसा सपकाल ने कहा।
उन्होंने कहा कि सरकार दावा कर रही है कि 10 वर्षों में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि 80 करोड़ लोगों को आज भी 5 किलो अनाज दिया जा रहा है। ऐसे में 25 करोड़ लोगों की गरीबी कैसे खत्म हुई, यह एक बड़ा सवाल है। यह पूरी तरह से आंकड़ों की बाजीगरी है। सोने का भाव दो लाख रुपये प्रति तोला और चांदी का भाव चार लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है, लेकिन इन कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है। महंगाई पर काबू पाने के लिए भी कोई ठोस नीति नजर नहीं आती।केंद्र सरकार भारी कर्ज के बोझ तले दब चुकी है। कर्ज लेकर योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन इससे आम लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार दिखाई नहीं देता।
आज भारत में आय और संपत्ति की असमानता ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है। देश की कुल आय का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के हिस्से में केवल 15 प्रतिशत आय आती है। देश की कुल संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत केवल शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास केंद्रित है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि देश की आर्थिक संरचना में गहरे असंतुलन को दर्शाने वाली स्थिति है। इस असमानता को दूर करने के बारे में इस बजट में एक शब्द भी नहीं है, ऐसा भी हर्षवर्धन सपकाल ने स्पष्ट किया।


