आओ गांव चलें…चइता — बोल रे बटोहिया

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सुरेश मिश्र /कवि/मुंबई वार्ता

नायिका विरह की आग में झुलस रही है। जब द्वारिकाधीश गोपियों को छोड़कर चले गए थे तो उन्होंने उद्धव को समझाने बुझाने के लिए भेजा था। जब सीता जी दुखी थीं तो श्रीराम ने बजरंगबली के मार्फत संदेश भेजकर समझाया।रमा के लिए रमापति ने जाने क्या क्या किया,मगर इस विरहन के स्वामी शहर जाकर सब कुछ भूल गए हैं।बेचारी पल पल मर मर कर जी रही है। चैत्र के महीने में आसमान में बदरिया भी नहीं है,वह किससे संदेश भेजे।

रास्ता निहार रही थी कि एक यात्री उधर से गुजरा। वह उस बटोही से ही शिकायती लहजे में पूछने लगी –

काहें क कोंहान हौ सुगनवां हो रामा बोल रे बटोहिया।

थकि गइली जोहि-जोहि, पिया कइ डगरिया

केकरा क लागि गइली, ओनके नजरिया अब काहें आवइं न सपनवां हो रामा,

बोल रे बटोहिया।

कान्हा भी ऊधो से भेजले खबरिया

हम तड़फड़ाई केउ न लावइ खबरिया

भला कइसे काटी रात-दिनवां हो रामा

बोल रे बटोहिया।

सिया तक सनेस लइके गइले बजरंगी

रमा बिन न जाने का-का किहेन अड़भंगी

धीर कइसे धरे मोरा मनवां हो रामा

बोल रे बटोहिया।

गरम-गरम लागे निमिया क छइयां

शीतला भी गरमी देखावइं अबकी दइयां

कइसे बीतइ चइत महिनवां हो रामा

बोल रे बटोहिया।

केतना बोलाई कागा आवे न अटरिया

कइसे सनेस भेजी,दिखे न बदरिया

चइत मा खाली असमनवां हो रामा

बोल रे बटोहिया।

हिचकी अउ सिसकी जगावइ सारी रतिया

हमरा करेजा चीरइ हमरी हलतिया

लइ लेइहैं अब का परनवां हो रामा

बोल रे बटोहिया।

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