मुंबई वार्ता/शिव पूजन पांडेय

भगवान परशुराम को विष्णु का छठा अवतार माना गया है और पृथ्वी के साथ चिरंजीवियों में एक माने जाते हैं। माना जाता है कि आज भी वह महेंद्र गिरी पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। ऐसे में महापुरुषों की तरह सार्वजनिक स्थानों पर उनकी मूर्तियां स्थापित नहीं की जा सकती हैं। पूर्व विधायक बाबा दुबे ने सार्वजनिक स्थलों पर किसी महापुरुष की तरह लगाई जा रही उनकी मूर्ति को धर्मशास्त्र के विरुद्ध बताते हुए उपरोक्त बातें कही।


उन्होंने कहा कि किसी भी भगवान की मूर्ति की तरह भगवान परशुराम की मूर्ति को भी प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही स्थापित की जानी चाहिए तथा नियमित उनकी पूजा अर्चना होनी चाहिए जबकि महापुरुषों की मूर्तियों के लिए प्राण प्रतिष्ठा और नियमित पूजा अर्चना लागू नहीं होता। बाबा दुबे ने कहा कि पिछले कुछ अरसे से भगवान परशुराम की मूर्तियों को लेकर राजनीति की जा रही है तथा राजनीतिक पिपासा की शांति के लिए ही उनकी मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं। परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भगवान परशुराम की मूर्ति को बिना प्राण प्रतिष्ठा किए सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित करके कर्तव्यों की इति श्री नहीं की जा सकती है।


उन्होंने कहा कि अच्छा होगा कि उनकी मूर्ति को मंदिर में स्थापित किया जाए तथा नियमित पूजा पाठ के लिए पुजारी रखे जाएं। उन्होंने कहा कि भगवान परशुराम को संसार के सात अमर लोगों में माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि कलयुग की समाप्ति पर वे भगवान कल्कि के रूप में एक बार फिर दुष्टों का संहार करेंगे। श्री दुबे ने कहा कि भगवान परशुराम भले ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे परंतु उनका कार्य पूरी तरह से क्षत्रियोचित था।
उन्होंने दुष्ट राजाओं का विनाश किया यही कारण है कि उन्हें ब्रह्म क्षत्रीय कहा जाता है। उन्होंने भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे योद्धाओं को शिक्षा दी थी।


