मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र सरकार ने राजस्व विभाग के अधीन संचालित राज्य की सभी 116 उप-जेलों (सब-जेल) को स्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया है। इनमें से 80 उप-जेल पहले से ही बंद थीं, जबकि 36 जेलें चालू होने के बावजूद जर्जर हालत में थीं। इस फैसले के साथ ही राज्य में मजिस्ट्रेटी जेलों की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।


शुक्रवार को जारी सरकारी प्रस्ताव (जीआर) में 1952 की उप-जेल नियमावली को भी निरस्त कर दिया गया है। सरकार ने यह निर्णय 2023 में गठित अध्ययन समूह की रिपोर्ट के आधार पर लिया है।
इन उप-जेलों में मुख्य रूप से सार्वजनिक शांति भंग करने, उपद्रव फैलाने या अन्य नागरिक प्रकृति के मामलों में मजिस्ट्रेटों के आदेश पर लोगों को रखा जाता था। अब ऐसे सभी बंदियों को जिला और केंद्रीय जेलों में स्थानांतरित किया जाएगा, जहां गंभीर अपराधों में बंद कैदी भी रहते हैं।
दरअसल, उप-जेलों की व्यवस्था जिला कलेक्टर (जिला मजिस्ट्रेट), उप-विभागीय अधिकारी (एसडीएम) और तहसीलदार (तालुका मजिस्ट्रेट) के अधिकार क्षेत्र से जुड़ी थी। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत ये अधिकारी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करते थे और जमानत या सदाचार बंधपत्र न देने वालों को उप-जेलों में भेजा जाता था।
हालांकि, अब सीआरपीसी की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) लागू हो चुकी है और ऐसे अधिकांश मामलों में पुलिस की भूमिका बढ़ गई है। सरकार का मानना है कि बदलती कानूनी व्यवस्था के चलते मजिस्ट्रेटी जेलों की प्रासंगिकता काफी कम हो गई है, इसलिए उन्हें स्थायी रूप से बंद करने का फैसला लिया गया है।


