श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भविष्य के प्रधानमंत्री पद को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद पार्टी का नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा, इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों और संभावनाओं पर लगातार चर्चा हो रही है। इसी बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीति और कथित यूजीसी कानून को लेकर पैदा हुआ विवाद इस आंतरिक सत्ता-समीकरण को प्रभावित करने वाला मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।


हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मौजूदा कार्यकाल ही अंतिम होगा या नहीं और उनके बाद प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा किसे आगे करेगी, इस बारे में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और संभावनाओं के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
योगी बनाम शाह की चर्चा


योगी आदित्यनाथ अपनी हिंदुत्ववादी छवि और उत्तर प्रदेश में मजबूत राजनीतिक पकड़ के लिए जाने जाते हैं। दूसरी ओर अमित शाह भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं और संगठन तथा चुनावी प्रबंधन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यही वजह है कि भाजपा के भविष्य के नेतृत्व को लेकर होने वाली चर्चाओं में दोनों नेताओं के नाम प्रमुखता से सामने आते हैं।


राजनीतिक विश्लेषण का एक वर्ग मानता है कि यदि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखते हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता में वापस लाने में सफल होते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद और बढ़ सकता है। इसके विपरीत, यदि उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा राजनीतिक झटका लगता है तो योगी की राष्ट्रीय नेतृत्व की दावेदारी कमजोर पड़ सकती है।
■ मध्य प्रदेश की राजनीति का उदाहरण
सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश की राजनीति का उल्लेख करते हुए दावा किया जाता रहा है कि अमित शाह ने अपने संभावित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने के लिए रणनीतिक राजनीति का सहारा लिया। विशेष रूप से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और एससी/एसटी कानून से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम को इस रणनीति से जोड़ने की कोशिश की गई है।
हालांकि, इन घटनाओं को अमित शाह की व्यक्तिगत रणनीति या किसी नेता को रास्ते से हटाने की पूर्व नियोजित योजना के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ठोस सार्वजनिक प्रमाण आवश्यक होंगे। इसलिए इसे राजनीतिक आरोप और लेखक के विश्लेषण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
हालाकि यह सर्वविदित है कि शिव राज सिंह चौहान के राजनीतिक कैरियर पर लगाम लगाने के लिए ही sc/St कानून तत्कालीन मध्यप्रदेश चुनाव के ठीक पहले लागू कर सवर्ण मतदाताओं को भड़काया गया और यह भी सर्वविदित है कि सत्ता जाने के बाद कॉंग्रेस के विधायकों को तोड़कर भाजपा की सत्ता स्थापित की गई।
■ नितिन गडकरी का नाम भी चर्चा से बाहर?
प्रधानमंत्री पद की संभावित दावेदारी को लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम भी समय-समय पर राजनीतिक चर्चाओं में आता रहा है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को लेकर उनके रुख और इस मुद्दे पर हुई राजनीतिक बहस के कारण उनकी संभावित दावेदारी पर सवाल उठाने का प्रयास किया गया है।
लेकिन किसी नेता की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी केवल किसी एक मुद्दे या राजनीतिक विवाद से समाप्त हो गई है, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। भाजपा के भीतर नेतृत्व का फैसला कई राजनीतिक और संगठनात्मक कारकों पर निर्भर करेगा।
■ यूजीसी कानून और उत्तर प्रदेश का सवर्ण वोट
इस पूरे राजनीतिक विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यूजीसी कानून को लेकर उत्तर प्रदेश में संभावित नाराजगी है। यूजीसी से जुड़े प्रावधानों को लेकर प्रदेश के सवर्ण मतदाताओं में भाजपा के प्रति नाराजगी पैदा हो गई है।
यह भी दावा किया जा रहा है कि सवर्ण मतदाता अब भाजपा के बजाय AIMIM, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी को वोट देने की बात कर रहे हैं। यदि ऐसी नाराजगी वास्तव में व्यापक जनसमर्थन में बदलती है, तो इसका असर आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है।
हालांकि, किसी पूरे सामाजिक वर्ग के मतदान व्यवहार के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए विश्वसनीय सर्वेक्षण और चुनावी आंकड़ों की आवश्यकता होगी।
■ क्या विधानसभा चुनाव बनेगा योगी की अग्निपरीक्षा?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा होगी। यदि भाजपा उनके नेतृत्व में सत्ता बरकरार रखने में सफल होती है तो योगी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता और राजनीतिक कद में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
वहीं, यदि भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता गंवानी पड़ती है, तो मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठ सकते हैं। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में उनकी दावेदारी भी कमजोर होने की संभावना पर राजनीतिक चर्चा तेज हो सकती है।
■ संघ की भूमिका पर भी निगाह
भाजपा के भविष्य के नेतृत्व को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। सूत्रों के अनुसार संघ और अमित शाह के बीच राजनीतिक मतभेद रहे हैं और संघ योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री पद के लिए अधिक उपयुक्त मान सकता है।
हालांकि, संघ की ओर से प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों को लेकर ऐसी कोई आधिकारिक स्थिति सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए संघ और शाह के बीच कथित मतभेद या संघ की किसी विशेष नेता के पक्ष में प्राथमिकता को फिलहाल राजनीतिक अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
■ यूजीसी कानून का भविष्य बताएगा राजनीतिक दिशा?
आगामी समय में यूजीसी से जुड़े विवाद का समाधान किस तरह होता है और इसका उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह महत्वपूर्ण होगा। यदि चुनाव से पहले विवादित प्रावधानों को लेकर कोई बड़ा राजनीतिक फैसला होता है और उससे सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी कम होती है, तो इसका लाभ भाजपा और योगी सरकार को मिल सकता है।
दूसरी ओर, यदि नाराजगी कायम रहती है और उसका असर चुनावी परिणामों में दिखाई देता है, तो भाजपा के भीतर नेतृत्व को लेकर नए समीकरण बन सकते हैं।
फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर कोई अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है। योगी आदित्यनाथ, अमित शाह या किसी अन्य नेता का नाम भविष्य में किस तरह आगे बढ़ता है, यह आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम तय करेंगे।
अब सवाल यही है कि भाजपा की अंदरूनी राजनीति किस दिशा में करवट लेती है—और उस करवट के बाद सत्ता की सवारी कौन करता है?


