अमेठी के साहित्यकार प्रदीप पांथ ने अपने घर को ही बना दिया परिंदों का आशियाना।

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राजेश विक्रांत/मुंबई वार्ता

घर के आंगन में चहचहाने वाली गौरैया जैसे परिंदे अब विलुप्ति की कगार पर हैं। शहरों में तेजी से गौरैया की संख्या घट रही है। यही वजह है कि अब गौरैया देखने को भी नहीं मिलती। इसलिए देश के कई शहरों में इस नन्हीं चिड़िया गौरैया के संरक्षण के लिए कई हाथ आगे आए हैं, जिन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य गौरैया संरक्षण को लेकर बना रखा है। इन्हीं में से एक हैं अमेठी के मुसाफिरखाना के साहित्यकार व शिक्षक प्रदीप पांथ यानी प्रदीप कुमार तिवारी जो पिछले पांच वर्षों से इनके संरक्षण के लिए अनूठे प्रयास कर रहे हैं।

उन्होंने अपने घर को ही गौरैयों के लिए एक सुरक्षित आशियाने का रूप दे दिया है।पांथ ने घर में आने वाले सामानों के खाली गत्ते के डिब्बों को घोंसलों में बदल दिया है। इन डिब्बों में उन्होंने गौरैया के प्रवेश और वेंटिलेशन के लिए छोटे-छोटे छेद बनाए हैं और इस प्रकार के लगभग 50 घोंसले बरामदे, लान और आंगन की दीवारों पर दीवारों पर टांग रखे हैं। इन घोंसलों में गौरैया घास-फूस से अपना बसेरा बनाकर न सिर्फ रहती हैं, बल्कि अब उनका प्रजनन भी हो रहा है। इन दिनों दो दर्जन से अधिक घोंसलों में गौरैयों के बच्चे पल रहे हैं।

प्रदीप पांथ कहते हैं कि गांवों की शांत सुबह से लेकर शहरों की चहल-पहल तक, गौरैया कभी अपनी खुशनुमा चहचहाहट से रंग भर देती थी। इन नन्हे पक्षियों के झुंड, बिन बुलाए ही सही, लेकिन स्वागत योग्य, अविस्मरणीय यादें बनाते थे। लेकिन समय के साथ, ये नन्हे दोस्त हमारी जिंदगी से गायब हो गए। कभी भारी संख्या में रहने वाली घरेलू गौरैया अब कई जगहों पर एक दुर्लभ दृश्य और रहस्य बन गई है। इन छोटे पक्षियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उनकी रक्षा करने के लिए लगभग पांच साल पहले 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस के दिन मुझे ख्याल आया कि क्यों न हम गौरैया संरक्षण के लिए कुछ करें और तब मुझे एक रास्ता मिल गया।

गौरैया को अनुकूल वातावरण देने के लिए प्रदीप पांथ ने अपने लान में कई गमले और पौधे लगाए हैं। यही वजह है कि बुलबुल जैसे अन्य परिंदे भी उनके घर में निवास करते हैं। प्रदीप पांथ खुद सुबह-शाम इन घोंसलों की देखरेख करते हैं और परिंदों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था भी करते हैं। इस कार्य मे उनके घर के लोग भी पूरा सहयोग देते हैं।गौरैया उनके घर में इतनी सहज महसूस करती हैं कि दाना-पानी खत्म होने पर वे चहचहाकर इसकी सूचना देती हैं।

प्रदीप पांथ का कहना है कि “सुबह के समय चिड़ियों की चहचहाहट जो सुकून देती है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।” वे लोगों से भी आग्रह करते हैं कि बिना किसी खर्च के थोड़े से प्रयासों से हम गौरैया के संरक्षण में योगदान दे सकते हैं।बता दें कि प्रदीप पांथ बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक होने के साथ-साथ कवि और गीतकार भी हैं।

15 जुलाई 1976 को पूरे पंडित मोहन राम तिवारी गांव में उनका जन्म हुआ था। उनकी शैक्षिक योग्यता परास्नातक (भौतिक शास्त्र), बीएड, बीटीसी है। वे हिंदी साहित्य सुवास मंच नामक साहित्यिक संस्था का संचालन करते हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- आईना (एकल काव्य संग्रह) (वर्ष 2021), दास्तान-ए-ज़िंदगी (एकल काव्य संग्रह) (वर्ष 2021), चलते रहना (एकल काव्य संग्रह) (वर्ष 2021), उम्मीद का दिया (युगल काव्य संग्रह) (वर्ष 2021), माटी का अभिनंदन (काव्यांजलि) (वर्ष 2022) और अंतस्ताप (कहानी संग्रह) (वर्ष 2023) है।

उनकी एक और कृति माधव तुम कब आओगे? (प्रबंध काव्य) प्रकाशकाधीन है।गौरैया संरक्षण के प्रदीप पांथ के अभिनव प्रयासों की चारों ओर सराहना भी होती है। उन्हें इस नेक कार्य के लिए अनेक पुरस्कार भी मिल चुके हैं। कवि पत्रकार प्रदीप सारंग कहते हैं कि प्रदीप पांथ के कार्य से सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए।

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