‘ऑपरेशन टाइगर’ के पीछे भाजपा नहीं, शिवसेना नहीं, बल्कि उबाठा गुट की अंदरूनी राजनीति ही जिम्मेदार:- नवनाथ बन।

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मुंबई वार्ता संवाददाता

‘ऑपरेशन टाइगर’ से भाजपा और शिवसेना का कोई संबंध नहीं है। यह पूरी तरह उबाठा गुट के भीतर चल रहे शीतयुद्ध और आंतरिक विवादों का परिणाम है। संजय राउत जिस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसी के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। संजय राउत, आप अपने सांसदों को अपने साथ नहीं रख पा रहे हैं और अपने विचारों को भी संभाल नहीं पा रहे हैं, इसलिए उबाठा गुट की यह स्थिति बनी है। यह कोई बांग्लादेश या पाकिस्तान नहीं है कि आपकी दबंगई यहां सहन की जाएगी। यदि आप किसी को धमकाने की कोशिश करेंगे, तो उसी भाषा में जवाब दिया जाएगा, ऐसा तीखा प्रहार भाजपा प्रदेश मुख्य प्रवक्ता नवनाथ बन ने बुधवार को किया। वे भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार परिषद को संबोधित कर रहे थे।

संजय राउत को अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने की आदत है। वे कमर के नीचे की भाषा बोलते हैं और लोगों को गालियां देते हैं। उनकी इसी भाषा पर महाराष्ट्र की जनता रोज नाराजगी जताती है और उनकी आलोचना करती है। लेकिन जिनकी प्रतिष्ठा समाप्त हो चुकी होती है, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे शब्दों का रोज उपयोग करना उनके लिए कोई नई बात नहीं है, ऐसा कहते हुए श्री बन ने उन्हें फटकार लगाई।

बन ने आगे कहा कि माता-पिता और साईंबाबा की शपथ लेकर न तो लोग टिकाए जा सकते हैं और न ही पार्टी को आगे बढ़ाया जा सकता है। यदि वंदनीय हिंदूहृदयसम्राट बाळासाहेब ठाकरे के विचारों के प्रति निष्ठा रखी होती, तो आज संजय राउत और उद्धव ठाकरे पर यह स्थिति नहीं आती। लोग पार्टी छोड़कर क्यों जा रहे हैं? क्योंकि उन्होंने अपने मूल विचार छोड़े, हिंदुत्व के विचार छोड़े और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। आने वाले समय में उबाठा गुट और संजय राउत की स्थिति इससे भी अधिक खराब होनेवाली है। असल में टाइगर कौन है और बकरी कौन, यह महाराष्ट्र की जनता पहले ही स्पष्ट कर चुकी है। संजय राउत, अब आपके पास सिर्फ गाढ़व नाका पर जाकर बयानबाजी करने के अलावा कुछ नहीं बचा है।संजय राउत आखिर किसके दम पर राज्यसभा पहुंचे? वे एकनाथ शिंदे के मतों के आधार पर राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे।

एकनाथ शिंदे और उनके सहयोगियों ने यदि मतदान नहीं किया होता, तो वे राज्यसभा सांसद नहीं बन पाते। यदि उनमें हिम्मत है तो वे कहें कि, “मैं एकनाथ शिंदे के मतों को अस्वीकार करता हूं। उनके मतों पर मुझे सांसद नहीं रहना है। मेरी दो वर्ष की सांसदकी शेष है, मैं तुरंत इस्तीफा देता हूं।” पहले उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए। वे शिवसेना के मूल सांसदों और विधायकों के समर्थन से सांसद बने हैं और वह भी बहुत कम अंतर से। इसलिए जो लोग एकनाथ शिंदे के मतों से सांसद बने हैं, उन्हें पहले अपना इस्तीफा देना चाहिए, राज्यसभा की सदस्यता छोड़नी चाहिए और फिर दूसरों से इस्तीफे की मांग करनी चाहिए। तब तक संजय राउत को किसी से इस्तीफा मांगने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, ऐसा भी बन ने कहा।

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