डॉ रवि रमेशचंद्र (एसोसिएट प्रोफेसर, अंतराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली)/ स्तंभकार/मुंबईवार्ता

विक्रम संपत के अनुसार “सावरकर बीसवीं सदी के सर्वाधिक विवादास्पद भारतीय राजनीतिज्ञ हैं। सावरकर हिन्दू राष्ट्र के विचार में यकीन रखते थे।” भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने विनायक दामोदर सावरकर को “माफी वीर” कहके संबोधित किया। हालांकि ये पहली बार हुआ है ऐसा नहीं। कांग्रेस, लेफ्ट और उनके समर्थक बुद्धिजीवी हमेशा से वीर सावरकर की देशभक्ति और निष्ठा पर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन उन्हें समग्रता में स्वीकार करने का साहस समर्थक और विरोधी दोनो में नहीं है।


28 मई विनायक दामोदर सावरकर (1883- 1966) की 142वी जन्मतिथि है। अपनी अंडमान यातना भरी जेल के दौरान वे हिंदुत्व की राजनीति के सबसे बड़े पैरोकार हो गए थे। उनका हिंदुत्व भारत की जमीन और उसके लोगों का इतिहास समेटने वाला शब्द है। उनके लिए हिंदुत्व शब्द एक सर्व समावेशी दर्शन था। अखंड सावरकर स्वीकार करना सहज भी नहीं है। सावरकर को महज स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देख कर उन्हें नहीं समझा जा सकता। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को समझने के लिए समग्र दृष्टिकोण चाहिए। सावरकर पर बहस अक्सर उथली होती है। जो उनके द्वारा लिखे गए माफी पत्र के इर्द गिर्द ही घूमती है। सावरकर की आलोचना भी अक्सर गैर हिन्दू वोट बैंक की राजनीति के बाहर नहीं हो पाती। उन्हें समझने में भारी गलत फहमी भी होती है। क्योंकि उनका अधिकांश लेखन उनकी मातृभाषा, मराठी में था। जिनका गलत भावार्थ या शब्दार्थ मुक्त अनुवाद सावरकर को गैर मराठी भाषी लोगों तक पहुंचने में बाधक बनता रहा है।


उन्हें एक विद्वान, इतिहासकार, समाजसुधारक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले वकील और सबसे ऊपर आजादी के लिए अपार कष्ट सहने वाले व्यक्ति के रूप में भी समझना जरूरी हैं। जाती पाती उन्मूलक सावरकर:सावरकर अपने समय से बहुत आगे थे। एक बार उन्होंने डॉ आंबेडकर और चोखामेला का जातिसूचक अपमान करने वालों को, ” मानवता और देवत्व दोनों का अपमान करना” कहा था। उन्होंने हिंदू समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था, छुआछूत को खत्म करने का प्रयास किया। एक रूढ़िवादी चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद हमेशा से हर जाति के घर जाते, भोजन करते और उन्होंने विदेश यात्रा भी की। सावरकर ने 1931 में “हिंदू समाज के सात बंधन” शीर्षक वाले निबंध में कहा था कि प्रतिभा और बुद्धि के निर्धारक के रूप में आनुवंशिकता गलत थी। समाज अगर अपने वेदोक्तबंदी, व्यवसायबंदी, स्पर्शबंदी, समुद्रबंदी, शुद्धिबंदी, रोटीबंदी और बेटीबंदी जैसे सात बंधनों को तोड़ दे तो वो और भी गौरवशाली बन जाय।


प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार विक्रम संपत के लिखते हैं, “सावरकर के अनुसार प्राय: आत्म-विरोधाभासी ये ग्रंथ मनुष्यों द्वारा रचे गए थे और एक विशेष संदर्भ में और एक विशेष समाज में प्रासंगिक थे। उन्होंने कहा कि समाज के आगे बढ़ने पर उन्हें विकसित होने या त्यागने की जरूरत है। उन्होंने जाति व्यवस्था को एक ऐसी बुराई के रूप में देखा, जिसने हिंदू समाज को विभाजित और विभाजित कर दिया, जिससे यह अन्य समूहों द्वारा हमलों और धर्मांतरण के लिए अतिसंवेदनशील हो गया।”
■ अंधविश्वास विरोधी सावरकर
सावरकर का जीवन एक आधुनिकतावादी, तर्कवादी और सामाजिक सुधार के प्रबल समर्थक के रूप में था। वे युवाओं से अपील करते थे की उन्हें स्वर्ग नरक की कल्पना में समय नष्ट करने के बजाय, इहलोक की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उनका कहना था, “मेरी देशभक्ति का व्रत अंधविश्वास से नहीं उपजा”। सावरकर ने सत्यनारायण व्रत कथा और संत ज्ञानेश्वर की जितनी आलोचना की है, वैसी आलोचना किसी और धर्म के व्यक्ति ने, अपने धर्म की, उस काल में नहीं किया। उन्होंने दूसरे धर्मों में भी व्याप्त अंधविश्वास की उतनी ही तीव्र आलोचना की थी। हर धर्म में स्वर्ग और नरक की कल्पना का सावरकर ने आलोचनात्मक खबर ली। उन्हें मालूम था, की आजादी की लड़ाई और भारत का पुनर्निर्माण वैज्ञानिक सोच और दृष्टिकोण से ही संभव है। अंधविश्वास जहां भी दिखे, उसे वहीं खींचना चाहिए, ऐसा सावरकर का स्पष्ट मत था। वे विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अंधविश्वास का इलाज मानते थे। वे कहते हैं, “कृपया समझें कि मैं प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति की निंदा करने से इनकार करता हूं। मैं चाहूंगा कि आधुनिक मशीनें तेजी से फैले ताकि पूरी मानवता खुश रहे।”
सावरकर ने अंधविश्वास फैलाने के लिए गांधी जी की तीव्र आलोचना की थी। महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में आधुनिक मशीनों और प्रौद्योगिकी की निंदा की थी। सावरकर ने उसका उत्तर देते हुए कहा, ” ट्रैक्टर के युग में लकड़ी के हल का क्या उपयोग है? मैं प्रकृति की ओर वापस जाने के चरखा दर्शन का घोर विरोध करता हूं।”
■ अल्पसंख्यकों के अधिकारों के पैरोकार
1939 में कलकत्ता में आयोजित हिंदू महासभा के वार्षिक सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में, सावरकर ने हिंदू और मुसलमानों को एक आम हिंदुस्तानी संवैधानिक राज्य में अपने ऐतिहासिक मतभेदों को दफन करने की बात कही। उनका कहना था,” हिंदुस्तान के भविष्य के संविधान को इस व्यापक सिद्धांत पर आधारित करना है कि सभी नागरिकों को जाति या पंथ, नस्ल या धर्म के बावजूद समान अधिकार और दायित्व होने चाहिए, बशर्ते वे अनन्य समर्पित तथा हिंदुस्तानी राज्य के प्रति निष्ठावान हों। भाषण, विवेक, पूजा, संगठन आदि की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का सभी नागरिकों द्वारा समान रूप से आनंद लिया जाएगा। राष्ट्रीय आपातकाल की सार्वजनिक शांति और व्यवस्था के हित में उन पर जो भी प्रतिबंध लगाए जाएंगे, वे केवल किसी धार्मिक या नस्लीय विचारों पर नहीं बल्कि सामान्य राष्ट्रीय आधार पर होंगे। समान अधिकारों का भी किसी भी मामले में अतिक्रमण नहीं किया जाना चाहिए।”
■ महान लेखक, भाषा विज्ञानी
सावरकर ने 10,000 से अधिक पन्ने मराठी भाषा में तथा 1500 से अधिक पन्ने अंग्रेजी में लिखा है। बहुत कम मराठी लेखकों ने इतना मौलिक लिखा है। उनकी “सागरा प्राण तळमळला”, “हे हिन्दु नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा”, “जयोस्तुते”, “तानाजीचा पोवाडा” “हिंदुत्व” अंग्रेजी में “द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857” आदि रचनाएं अत्यन्त लोकप्रिय हैं। उनकी कुल 40 पुस्तकें उपलब्ध हैं। भाषाशुद्धि का आग्रह धरकर सावरकर ने मराठी भाषा को 42 से अधिक पारिभाषिक शब्द दिये। जैसे टपाल, प्राचार्य, मुख्याध्यापक, चित्रपट, अर्थसंकल्प आदि। हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सावरकर सन् 1906 से ही प्रयत्नशील थे।
सावरकर ने हिन्दी साहित्य, व्याकरण, प्रौढ़ता, भविष्य और क्षमता को समझाते हुए हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा के सर्वथा योग्य बताया था।इतिहासकार और संगठनकर्ता:सावरकर की इतिहास की ओर सतर्क नजर थी। भारत में जनमानस का इतिहास बोध बेहद कमजोर और बहुमत प्रभावित रहा है। इसकी दो वजहें हैं। एक तो हजारों वर्षों से शक, कुषाण, हूण, यूनानी, मुस्लिम और ईसाइयत की राजनीतिक- धार्मिक ताकतों का लगातार आक्रमण और सांस्कृतिक अतिक्रमण रहा है। दूसरी वजह है मध्य काल तक सिर्फ सनातनियों के मंदिर तोड़े गए, ग्रंथ जलाए गए, उपासना पद्धतियों पर रोक लगाई गई। लेकिन अंग्रेजों ने भारतीयों की आस्था को तोड़ा। यहां की प्रचलित ज्ञान व्यवस्था को, अंग्रेजी स्कूल आधारित शिक्षा व्यवस्था में बदल डाला। महात्मा गांधी, सरदार पटेल, पंडित नेहरू, शहीद भगत सिंह, डा. आंबेडकर, मौलाना आजाद की ही तरह, सावरकर ने भी आजादी की लड़ाई के साथ ही, भारत की खंडित आस्था का भी जीर्णोधार करने पर जोर दिया था। लेकिन क्या इतिहास के प्रति उदासीन महात्मा गांधी, इतिहास बोध में गहराई से उतरे नेहरू और सावरकर ने भविष्य के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर कुछ विचार किया था? क्या वर्तमान की गुत्थियां सुलझाने के लिए इतिहास की गलतियों को भूलना जरूरी होता है? इन प्रश्नों के उत्तर हमें खुद तलाशने होंगे। नहीं तो गिलास आधा खाली, या आधा भरे वाली स्थिति में समाज रहेगा।
अपने नायकों को इसी तरह राजनीति एजेंडे की वेदी पर बलि देता रहेगा। सावरकर भी इसी पक्षपाती राजनीति का शिकार हुए हैं। इसलिए जब भी किसी महापुरुष के नाम या काम की आलोचना, टीका, टिप्पणी होती है तो औसत सोच वाले लोग, उसका सामना नहीं कर पाते। क्योंकि उन्होंने उस महापुरुष के आदर्शों न तो चिकित्सक पद्धति से जाना और ना ही व्यवहारिक जीवन में उतार पाए। जाहिर है उनकी प्रतिक्रिया हिंसात्मक और उग्र होगी। यही औसत सोच राजनीति का प्रमुख आहार है। औसत सोच का पोषण करने वाले लोग, अस्तित्व और अस्मिता जैसे गहरे विषयों को, वोट बैंक की सतही सोच से जोड़कर समाज के भोले लोगों का ध्यान जरूरी मुद्दों से हटाकर, भावनात्मक काला बाजारी की तरफ ले जाते हैं। अतः सावरकर को समग्रता से जाने और पढ़े बिना उनका समर्थन और विरोध दोनो ही घातक हो सकता है।


