श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

मुंबई महानगर पालिका (BMC) के आगामी चुनावों से पहले मुस्लिम महापौर को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हो गई है। इस मुद्दे पर AIMIM और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता संजय राउत के बयान सामने आने के बाद सियासी गलियारों में चर्चा तेज़ हो गई है।


● बीएमसी चुनाव से पहले नया राजनीतिक मुद्दा
देश की सबसे अमीर महानगर पालिका मानी जाने वाली बृहन्मुंबई महानगर पालिका पर लंबे समय से राजनीतिक दलों की नज़र है। आगामी चुनावों में सत्ता परिवर्तन और गठबंधन की संभावनाओं के बीच महापौर पद को लेकर सांप्रदायिक और सामाजिक समीकरण भी खुलकर सामने आ रहे हैं।
● AIMIM का दावा
“योग्यता के आधार पर बने महापौर”ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन (AIMIM) के नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि, “अगर बीएमसी में संख्या बल मिला तो महापौर का चयन धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया और योग्यता के आधार पर होना चाहिए।”
AIMIM का कहना है कि मुंबई की बड़ी मुस्लिम आबादी को प्रतिनिधित्व मिलना कोई असंवैधानिक मांग नहीं है। पार्टी नेताओं ने यह भी संकेत दिए कि अगर ज़रूरत पड़ी तो AIMIM बीएमसी चुनाव अकेले भी मैदान में उतर सकती है।
● संजय राउत का बयान “महापौर का धर्म मुद्दा नहीं”
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय राउत ने इस बहस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि> “भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है। महापौर किस धर्म से है, यह मुद्दा नहीं होना चाहिए। जिसे जनता चुने, वही महापौर बने।”हालांकि, राउत ने यह भी साफ किया कि उनकी पार्टी की प्राथमिकता मुंबई के हित, मराठी अस्मिता और शहर के विकास से जुड़ी राजनीति है, न कि धर्म आधारित ध्रुवीकरण।
● बीजेपी और अन्य दलों की प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे पर भाजपा और अन्य दलों के नेताओं ने भी अपने-अपने बयान दिए हैं।भाजपा नेताओं ने कहा कि महापौर का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होगा।वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि कुछ दल इस मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति के लिए हवा दे रहे हैं।
● मुस्लिम वोट बैंक पर सबकी नज़र
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, मुंबई के कई वार्डों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि लगभग सभी दल मुस्लिम मतदाताओं को साधने की रणनीति बना रहे हैं। मुस्लिम महापौर का मुद्दा उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
● निष्कर्ष
बीएमसी चुनाव नज़दीक आते ही मुस्लिम महापौर का मुद्दा सियासी बहस का केंद्र बनता जा रहा है। AIMIM इसे प्रतिनिधित्व का सवाल बता रही है, जबकि संजय राउत इसे गैर-ज़रूरी विवाद मानते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ज़ोर दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी राजनीति में और तेज़ होने की संभावना है।


