■ श्रावण मास के अवसर पर ग्रंथराज ज्ञानेश्वरी प्रवचन में विचार व्यक्त ।
मुंबई वार्ता/हरीशचंद्र पाठक

“तरी अवधान एकले दिजे, मग सर्व सुखांसी पात्र होईजे” — इस ज्ञानेश्वरी की ओवी (श्लोक) को उद्धृत करते हुए ह.भ.प. अंकुश महाराज कुमठेकर ने श्रोताओं के मन में आध्यात्मिक रस घोल दिया। इस ओवी का भाव स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “संतों की संगति से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है। परमेश्वर सर्वत्र है, हमारे भीतर भी है, परंतु यदि हमें उसका साक्षात्कार करना है, तो संतों की सेवा करनी होगी, उनकी वाणी से ज्ञान लेना होगा।”


श्रावण मास के पावन अवसर पर घाटकोपर स्थित बालगोपाल भजन मंडल और रायगढ़ क्रीड़ा मंडल द्वारा संयुक्त रूप से ग्रंथराज ज्ञानेश्वरी प्रवचन का आयोजन किया गया है। यह प्रवचन श्रृंखला 26 जुलाई से 24 अगस्त 2025 तक प्रतिदिन रात्रि 9:30 से 10:30 बजे तक एक घंटे के लिए आयोजित की गई है। इस प्रवचनमाला का समापन 24 अगस्त को ह.भ.प. बाळकृष्ण महाराज अहिरे के भक्तिमय कीर्तन से होगा।


प्रवचन के दौरान अंकुश महाराज कुमठेकर ने आगे कहा, “परमार्थ के मार्ग में मन, वाणी और शरीर — इन तीनों से ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। कथा, कीर्तन और भजन के माध्यम से आत्मिक शांति प्राप्त होती है, और यही मार्ग अंततः ईश्वर दर्शन की ओर ले जाता है।”ज्ञानेश्वरी के नववें अध्याय की पहली ओवी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “ज्ञानोबा माऊली इस ओवी के माध्यम से हमें ‘अवधान देने’ का संदेश देते हैं। इसका अर्थ है कि जब हम एकाग्रता से कथा या कीर्तन सुनते हैं, तो हमारे अंतरमन की शुद्धि होती है और वहीं से ईश्वर के अनुभव की शुरुआत होती है।”


