स्कूली परीक्षाओं का राज्य-स्तरीय कार्यक्रम तय करने से स्कूलों की स्वायत्तता पर सवाल, सरकारी हस्तक्षेप से बढ़ेंगी समस्याएं।

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मुंबई वार्ता/हरीशचंद्र पाठक

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत महाराष्ट्र सरकार ने स्कूलों में परीक्षाओं का कार्यक्रम राज्य स्तर पर तय करने का फैसला किया है। स्कूली शिक्षा विभाग के नए सरकारी निर्णय के अनुसार, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के निदेशक, राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) के निदेशकों की सलाह पर यह कार्यक्रम निर्धारित करेंगे।इस फैसले से शिक्षा जगत में नाराजगी फैल गई है।

मुंबई कांग्रेस के रोजगार व स्व-रोजगार विभाग के महासचिव और शिक्षाविद् डॉ. सत्तार खान ने कहा कि इससे स्कूलों की परीक्षा आयोजन की स्वायत्तता प्रभावित होगी। पहले स्कूलों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार परीक्षाएं आयोजित करने की स्वतंत्रता थी, लेकिन अब राज्य सरकार का यह हस्तक्षेप ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है, क्योंकि यह स्थानीय समस्याओं और भौगोलिक विविधता को नजरअंदाज करता है।

खान ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे सरकारी निर्णयों में विसंगतियों की आशंका बनी रहेगी।पिछले शैक्षणिक वर्ष में, एससीईआरटी द्वारा कक्षा 1 से 9 तक के दूसरे सेमेस्टर के कार्यक्रम की घोषणा के बाद कई स्कूलों को अप्रैल के अंत तक खुला रखना पड़ा था। वहीं, प्रसिद्ध हिंदी और मराठी अखबार *त्रिलोक विवेचना* के युवा संपादक संदीप त्रिलोकीनाथ शुक्ला ने कहा कि कक्षा 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं का राज्य-स्तरीय एकसमान कार्यक्रम स्वाभाविक है, लेकिन कक्षा 1 से 9 तक की परीक्षाओं को पूरे राज्य में एक ही समय पर आयोजित करना व्यवहारिक नहीं है।

उन्होंने बताया कि कई स्कूलों में पहली घटक परीक्षा शुरू हो चुकी है, क्योंकि शैक्षणिक सत्र को एक माह से अधिक समय बीत चुका है। ऐसे में शिक्षा विभाग को यह नया नियम शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू करना चाहिए, साथ ही शिक्षकों और अभिभावकों को विश्वास में लेना चाहिए। शुक्ला ने यह भी कहा कि स्कूली स्तर की परीक्षाओं में शिक्षा विभाग का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

उनका मानना है कि राज्य-स्तरीय कार्यक्रम केवल बुनियादी या बोर्ड परीक्षाओं के लिए ही स्वीकार्य है।शुक्ला सहित कई शिक्षकों और शैक्षणिक संगठनों ने इस फैसले का विरोध किया है। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्थानीय जरूरतों के अनुसार लचीले कार्यक्रम की व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख है। इस फैसले से शिक्षकों और स्कूलों की स्वायत्तता पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

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