- आरपीआई और सीपीएम ने उठाई 12-12 सीटों की मांग
मुंबई (सं. भा.) महाराष्ट्र की राजनीति में छोटे दलों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह भूमिका और भी बढ़ गई है। रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई-ए) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) जैसी पार्टियां, भले ही अपनी खुद की सीट पर जीत हासिल करने में संघर्ष करती हों, लेकिन उनके मजबूत वोट बैंक के कारण वे अपने सहयोगी दलों को चुनाव जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इन पार्टियों को पता है कि वे अकेले चुनावी मैदान में उतरीं तो जीत की संभावना बेहद कम होगी, लेकिन महाराष्ट्र में दोनों प्रमुख युतियां (एनडीए और महाविकास अघाड़ी) के लिए उनका समर्थन बहुत जरूरी है। यही कारण है कि ये पार्टियां अपने सहयोगियों से 12-12 सीटों की मांग कर रही हैं, ताकि गठबंधन के तहत उनकी भूमिका और प्रभाव सुनिश्चित हो सके।


इसीलिए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के लिए गठबंधन दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर लगातार तनाव बढ़ता जा रहा है। जहां एक ओर महायुति (भाजपा, शिंदे गुट, अजीत पवार गुट) के सहयोगी दलों के बीच आपसी रस्साकशी चल रही है, वहीं दूसरी ओर महाविकास आघाडी (शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (एसपी), कांग्रेस) में भी छोटे दलों के साथ तालमेल बनाने में मुश्किलें सामने आ रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई-ए) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने अपने-अपने गठबंधनों से 12-12 सीटों की मांग की है, जिससे राजनीतिक परिदृश्य और जटिल हो गया है।
महायुति में रामदास आठवले की सीटों की मांग से बढ़ा तनाव
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की तैयारी जोरों पर है, लेकिन महायुति के भीतर टिकट बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही है। केंद्रीय मंत्री और आरपीआई (ए) के नेता रामदास आठवले ने महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले को एक पत्र लिखकर आगामी चुनावों में अपनी पार्टी के लिए 12 सीटों की मांग की है। आठवले की यह मांग भाजपा, शिंदे गुट, और अजीत पवार गुट के बीच पहले से चल रहे सीट बंटवारे के मुद्दों को और जटिल बना रही है।
आठवले ने अपने पत्र में मुंबई के शिवाजीनगर, मलाड, और धारावी जैसे इलाकों में दावेदारी पेश की है। इन सीटों पर फिलहाल कांग्रेस का प्रभाव है, लेकिन आरपीआई के नेता इन्हें महायुति के हिस्से में लाने के लिए प्रयासरत हैं। शिवाजीनगर विधानसभा सीट पिछले कुछ चुनावों से भाजपा के प्रभाव में है, जबकि मलाड और धारावी कांग्रेस के गढ़ माने जाते हैं। मलाड पश्चिम से कांग्रेस विधायक असलम शेख पिछले तीन चुनावों से जीतते आ रहे हैं, जबकि धारावी की सीट 2004 से कांग्रेस के पास है। ऐसे में देखना होगा कि भाजपा इन सीटों को आरपीआई को सौंपती है या नहीं।
रामदास आठवले का यह बयान कि उनकी पार्टी को कम से कम 12 सीटों पर लड़ने का मौका मिलना चाहिए, महायुति के भीतर तनाव को और बढ़ा रहा है। विदर्भ क्षेत्र में आठवले ने तीन से चार सीटों की मांग की है, जबकि मुंबई में भी उन्होंने अपने लिए कुछ सीटों की दावेदारी की है। महायुति के पास पहले से ही 208 विधानसभा सीटें हैं, जिन पर चर्चा की जरूरत नहीं है, लेकिन बाकी 80 सीटों को लेकर बातचीत जारी है।

महा विकास आघाडी से सीपीएम की 12 सीटों की मांग
महाविकास आघाडी के गठबंधन में भी सीटों के बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ रहा है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने महा विकास आघाडी के नेताओं से मुलाकात कर अपनी 12 सीटों की मांग स्पष्ट कर दी है। सीपीएम के प्रदेश सचिव डॉ. उदय नारकर ने बताया कि उनकी पार्टी ने पहले ही अपनी प्रभावशाली सीटों की सूची शरद पवार, उद्धव ठाकरे, नाना पटोले, और बालासाहेब थोरात को सौंपी है।
सीपीएम का आरोप है कि महा विकास आघाडी में शामिल बड़ी पार्टियां (शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (एसपी), कांग्रेस) छोटे दलों को नजरअंदाज कर रही हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी इन तीनों पार्टियों ने सीटों का बंटवारा आपस में कर लिया था और छोटे दलों से केवल वोट मांगने की अपील की थी। सीपीएम ने तब भी इस रवैये का विरोध किया था और अब विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह का व्यवहार देखकर पार्टी ने नाराजगी जताई है।
सीपीएम का कहना है कि यदि उन्हें 12 सीटें नहीं दी जातीं तो यह महा विकास आघाडी की एकता के लिए घातक साबित हो सकता है। पार्टी ने महा विकास आघाडी के नेताओं से अपील की है कि वे पहले छोटे दलों की सीटों पर विचार करें और फिर बाकी सीटों का बंटवारा करें।
सीट बंटवारे के राजनीतिक मायने
महाराष्ट्र की राजनीति में सीटों का बंटवारा हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। राज्य में 288 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से हर पार्टी अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती है। छोटे दल, चाहे वह महायुति में हों या महा विकास आघाडी में, गठबंधन के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इन पार्टियों का खुद का वोट बैंक भले ही उतना बड़ा न हो, लेकिन वे बड़े दलों के लिए अहम भूमिका निभा सकते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण महत्वपूर्ण होते हैं।
आरपीआई (ए) और सीपीएम जैसी पार्टियां जानती हैं कि उनके लिए स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़कर जीतना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अपने गठबंधन के साथ मिलकर वे अपनी भूमिका को सुनिश्चित कर सकती हैं। यही वजह है कि दोनों पार्टियां अपने-अपने गठबंधन से 12 सीटों की मांग कर रही हैं।
भविष्य की रणनीतियां और संभावनाएं
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में सीटों का बंटवारा अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। महायुति और महा विकास आघाडी दोनों ही इस वक्त छोटे दलों की मांगों को लेकर असमंजस में हैं। बड़े दलों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने सहयोगी दलों की मांगों को ध्यान में रखें, क्योंकि चुनावों में इनकी मदद से ही वे महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं।
महायुति में जहां रामदास आठवले और उनके आरपीआई (ए) की 12 सीटों की मांग ने राजनीतिक गणित को और जटिल बना दिया है, वहीं महा विकास आघाडी में सीपीएम की मांग से गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे दोनों गठबंधन अपनी-अपनी सीटों का बंटवारा करते हैं और छोटे दलों को संतुष्ट कर पाते हैं या नहीं।
अंततः, महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की राजनीतिक स्थितियों का यही संकेत है कि छोटे दल अपनी शक्ति और महत्ता को बड़े दलों के सामने साबित करने में लगे हैं। सीट बंटवारे का यह संघर्ष राजनीतिक समीकरणों को नया रूप दे सकता है और इसके परिणाम राज्य की राजनीति पर गहरा असर डाल सकते हैं।


