भरतकुमार सोलंकी/मुंबई वार्ता
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार हमें एक कड़वी सच्चाई का सामना कराते हैं। वहाँ यह नहीं पूछा जा रहा कि आप ब्राह्मण हैं, राजपूत हैं, अहीर हैं या दलित। वहाँ केवल इतना देखा जा रहा हैं कि आप हिंदू हैं। लेकिन इस भयावह परिस्थिति ने एक और सवाल खड़ा कर दिया हैं—क्या हम इन जातियों और पहचान के लेबलों से ऊपर उठ सकते हैं? क्या संकट की यह चेतावनी हमें एक होने के लिए प्रेरित कर सकती हैं?
कई लोग अपील कर रहे हैं कि भारत में हमें जातियों के बंटवारे को भूलकर खुद को “हिंदू” के एकल लेबल में ढाल लेना चाहिए। यह विचार कुछ हद तक एकता का आह्वान करता हैं, लेकिन क्या यह असल समाधान हैं? जब तक हमारे भीतर जातीय और वर्गीय भेदभाव की सोच जीवित हैं, तब तक “हिंदू” का लेबल भी केवल एक नया आवरण होगा। क्या गारंटी हैं कि इस नए लेबल के बाद भी हम एकता का आदर्श स्थापित कर पाएंगे?इससे भी बड़ा सवाल यह हैं कि क्या हम केवल एक और लेबल अपनाकर अपने समाज की विभाजनकारी सोच को बदल सकते हैं? क्या हम यह नहीं समझ सकते कि असली बदलाव बाहर की पहचान से नहीं, बल्कि भीतर की सोच से शुरू होता है?
अगर हमें वाकई एकता चाहिए, तो क्यों न “इंसान” के लेबल को अपनाया जाए? आखिर, इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं हैं।लेकिन क्या हम इसके लिए तैयार हैं? क्या हम इंसानियत को अपनाने की हिम्मत जुटा सकते हैं? या हम बार-बार एक लेबल से दूसरे लेबल में फंसते रहेंगे, बिना यह समझे कि हमारी असली समस्या हमारी सोच में है? जातियों के बंटवारे से बचने के लिए “हिंदू” का लेबल लगाना, लेकिन भीतर से वही भेदभाव और संकीर्णता बनाए रखना, क्या यह बदलाव का मार्ग हो सकता हैं?यह बिल्कुल वैसा ही हैं जैसा एक अंधविश्वास से निकलकर दूसरे अंधविश्वास में प्रवेश करना।
धर्म, जाति और वर्ग के नए-नए ठप्पे लगाकर हम केवल बाहरी आवरण बदलते हैं, भीतर से वही संकीर्ण मानसिकता बनी रहती हैं।क्या यह समय नहीं हैं कि हम लेबल से परे सोचें और अपने भीतर के इंसान को जागृत करें?बांग्लादेश की स्थिति हमें चेतावनी देती हैं कि अगर कभी ऐसा संकट हिंदुस्तान में आया, तो क्या बंटा हुआ समाज टिक पाएगा? क्या जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर बंटा हुआ हिंदू समाज उस समय एकजुट होकर खड़ा हो सकेगा? या हम तब भी अपने बिखरे हुए टुकड़ों में संघर्ष करते रहेंगे?यह समय हैं अपनी पहचान को फिर से परिभाषित करने का। “हिंदू” या “मुस्लिम” से पहले हमें इंसान बनना होगा। इंसानियत का धर्म सबसे बड़ा हैं, क्योंकि इसमें कोई भेदभाव, कोई सीमाएँ नहीं हैं। यह हमें एकता और समानता का असली मार्ग दिखाता हैं।
सवाल यह हैं—क्या हम इस पहचान को अपनाने के लिए तैयार हैं?हमारा भविष्य इस बात पर निर्भर करता हैं कि हम आज कौन-सा रास्ता चुनते हैं। क्या हम लेबलों के इस चक्रव्यूह से निकलकर इंसानियत का मार्ग अपना सकते हैं? या हम नए लेबल लगाते हुए उसी विभाजनकारी सोच को जारी रखेंगे? जवाब हमारे हाथ में हमारी सोच में हैं।


