ज्ञानेंद्र मिश्र/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

■ मुस्लिम उम्मा की चुप्पी का राज
एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, जब इजरायल ने ईरान की राजधानी तेहरान को धुआं-धुआं कर दिया। मगर हैरानी की बात है कि मुस्लिम उम्मा की तरफ से न कोई आवाज उठी, न ही ईरान के लिए कोई मदद का हाथ बढ़ा। कहां हैं ऑटोमन साम्राज्य का झंडा थामने वाले मियां एर्डोगन? कहां हैं मुस्लिम उम्मा के परमाणु बम के ख्वाब दिखाने वाले पाकिस्तान के सेना प्रमुख मियां मुनीर? मध्य पूर्व के दर्जनों मुस्लिम देश जैसे सांप सूंघ गए हों! आखिर ये सन्नाटा क्यों?


■ मुस्लिम उम्मा: अवधारणा और हकीकत
मुस्लिम उम्मा’ अरबी का शब्द है, जिसका मतलब है “मुस्लिम समुदाय” या “मुस्लिम राष्ट्र”। ये दुनिया भर के उन मुसलमानों को जोड़ता है, जो इस्लाम के अनुयायी हैं। इस्लामी शिक्षाओं में मुस्लिम उम्मा की अवधारणा बेहद अहम है, जो एकता और भाईचारे का पैगाम देती है।
■ मुस्लिम उम्मा की खासियतें
आपसी एकता और भाईचारा:
मुस्लिम उम्मा के लोग एक-दूसरे के लिए एकजुटता और भाईचारे का जज्बा रखते हैं।
■ साझा मूल्य और सिद्धांत:
इस्लाम के साझा मूल्यों और सिद्धांतों पर चलते हैं।
विविधता में एकता:अलग-अलग देश, संस्कृतियां, फिर भी एक ही धर्म के तहत एकजुट।
■ मुस्लिम उम्मा की असलियत
मुस्लिम उम्मा की ये अवधारणा मुसलमानों को एक-दूसरे से जोड़ने और चुनौतियों का मिलकर सामना करने की प्रेरणा देती है। लेकिन हकीकत में क्या? इजरायल से तेहरान की दूरी करीब 2000 किलोमीटर है। कोई भी लड़ाकू विमान बिना मिड-एयर रिफ्यूलिंग के तेहरान पर बमबारी कर वापस नहीं लौट सकता। इसका मतलब साफ है—इजरायल मुस्लिम देशों के हवाई क्षेत्र का खुलेआम इस्तेमाल कर रहा है। ये मुस्लिम उम्मा की एकता का मजाक नहीं तो और क्या है?*तुर्की: न उगलते बनता, न निगलते*तुर्की की हालत गले में अटकी हड्डी जैसी है। तुर्की और ईरान तो मुस्लिम उम्मा की सियासी बादशाहत के लिए हमेशा से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहे हैं। जाहिर है, तुर्की चाहेगा कि ईरान कमजोर हो जाए, भले ही खत्म न हो। ऊपर से अब्राहम अकॉर्ड के तहत तुर्की इजरायल के साथ रिश्ते सुधारने की जुगत में है। ऐसे में ईरान के पक्ष में कोई कदम उठाना तुर्की-इजरायल के नए-नवेले दोस्ती को बिगाड़ सकता है।
■ बाकी मुस्लिम देशों का ढोंग
मुस्लिम उम्मा के बाकी देशों की प्रतिक्रियाएं भी बस खानापूर्ति जैसी हैं:सऊदी अरब ने इजरायल के हमलों को “गंभीर और चिंताजनक” बताया, लेकिन कि जबस इतना ही।ओमान ने हमलों को “खतरनाक और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए हानिकारक” कहा, और चुप।पाकिस्तान तो अमेरिका का नमक खाकर(पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ने गत दिनों राष्ट्रपति ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में लंच का लुत्फ उठाया था) इतना पंगु हो चुका है कि उसने इजरायल के हमलों को चुपके सेऊ “अनुचित” कहा और उल्टा ट्रंप को नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित कर दिया।
■ ईरान के आतंकी साथी:
कमर टूटी, हिम्मत छूटीईरान के आतंकी दोस्त—हमास, सीरिया, हिजबुल्लाह, हूती—इनकी तो इजरायल ने पिछले एक साल में कमर ही तोड़ दी। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकियों ने इजरायल पर हमला किया और बंधकों को गाजा ले गए। तब से इजरायल ने सुनियोजित ढंग से ईरान के छद्म युद्ध की रीढ़—हमास और बाकी आतंकी संगठनों—को एक-एक कर कुचल दिया। आज हालत ये है कि जब ईरान को अपने इन “दोस्तों” की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब कोई भी खड़ा होने लायक नहीं बचा। ये सब इजरायल की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था।
■ मुस्लिम उम्मा: बस एक खोखला सपना
साफ है कि मुस्लिम उम्मा की अवधारणा अब सिर्फ किताबों और तकरीरों तक सिमट गई है। इजरायल, जो न सिर्फ अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ दुनिया का झंडा बुलंद कर रहा है, उसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से न सिर्फ दुनिया के तमाम देशों का समर्थन है, बल्कि मुस्लिम उम्मा के देश भी चुपके से उसके साथ खड़े दिखते हैं। मुस्लिम उम्मा अब बस एक आदर्शवादी ख्याल बनकर रह गया है।
■ कहां है रूस?:
युद्ध में लहूलुहान और लाचार रूस की बात करें तो वो खुद यूक्रेन के साथ सालों से जंग लड़ते हुए खून से लथपथ है। वो न तो व्यावहारिक रूप से, न ही नैतिक रूप से किसी और युद्ध में कूदने की हालत में है। फिर भी उसने इजरायल और ईरान को “युद्ध रोकने” की सलाह दी, जिसे अमेरिका ने एक झटके में खारिज कर दिया। हैरानी की बात ये भी है कि ईरान ने रूस से कोई मदद नहीं मांगी। जाहिर है,ए दोनों के बीच कोई रणनीतिक खटपट तो है ही। वैसे भी, रूस और चीन की चालें दुनिया के किसी भी सियासी मसले में कदम-से-कदम मिलाकर चलती हैं।
■ भारत: रणनीति और कूटनीति काऊज संतुलन
अब बात भारत की। जैसा कि पहले कहा गया, भारत के रणनीतिक हित इजरायल के साथ हैं, तो आर्थिक हित ईरान से जुड़े हैं। लेकिन आज की तेजी से बदलती दुनिया में अगर आप रणनीतिक फायदे छोड़कर सिर्फ आर्थिक मुनाफे के पीछे भागेंगे, तो कल आपका वजूद ही खतरे में पड़ सकता है।*भारत की कूटनीति*भारत ये बात अच्छे से समझता है। पिछले 10-12 सालों में भारत ने अपनी कूटनीति से दुनिया भर के देशों के साथ रिश्तों का बखूबी संतुलन बनाया है। ईरान और इजरायल के साथ भी भारत सधे कदमों से संतुलन साधे हुए है।
■ भारत-इजरायल:नेचुरल दोस्ती
लेकिन सच तो ये है कि ईरान के साथ भारत का रिश्ता आर्थिक और कूटनीतिक फायदों का है, मगर इजरायल भारत का “नेचुरल एलाई” है। दोनों के बीच दोस्ती स्वाभाविक और गहरी है।
■ भारत की रणनीति
अगर भारत को किसी की मदद करनी पड़े, तो वो इजरायल की ही होनी चाहिए, हालांकि कूटनीति में ऐसा खुलकर तब तक नहीं कहा जाता, जब तक हालात न आएं। दुनिया जानती है कि आतंकवाद को पालने-पोसने में ईरान का सबसे बड़ा हाथ है। चीन भी इसमें शामिल है, लेकिन वो ईरान के जरिए ही आतंकी गतिविधियों को हवा देता है। ऐसे में भारत को जब तक मजबूरी न हो, इस युद्ध में दखल देने से बचना होगा- “ये युद्ध का युग नहीं है” जैसे आदर्शवादी बयानों के साथ बयान-वीर की भूमिका में रहना ही समझदारी है।


