एचडीएफसी बैंक के CEO शशिधर जगदीशन को बड़ी राहत, बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिश्वतखोरी का केस किया रद्द।

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मुंबई वार्ता संवाददाता


HDFC Bank के प्रबंध निदेशक और CEO Sashidhar Jagdishan के खिलाफ दर्ज रिश्वतखोरी का मामला Bombay High Court ने मंगलवार को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह शिकायत बैंक द्वारा शुरू की गई 65 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली कार्रवाई के जवाब में दायर की गई थी।


न्यायमूर्ति मकरंद कर्णिक और न्यायमूर्ति नितीन बोरकर की खंडपीठ ने जगदीशन की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज FIR और मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश को भी रद्द कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि उपलब्ध सबूतों के आधार पर इस मामले में पुलिस जांच उचित नहीं थी और यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होता।

■ अदालत की अहम टिप्पणी


हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट द्वारा की गई शिकायत महज बैंक की रिकवरी प्रक्रिया का “प्रत्युत्तर” है। साथ ही, यह भी माना कि ट्रस्ट के पूर्व और वर्तमान ट्रस्टियों के बीच चल रहे विवाद और तनाव का असर इस मामले में देखने को मिला।


अदालत ने ट्रस्ट के उस दावे को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि 2024 में ट्रस्ट के संस्थापक किशोर मेहता की मृत्यु बैंक के दबाव के कारण हुई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस घटना के लिए बैंक अधिकारियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

■ क्या है पूरा मामला?


मामला “स्प्लेंडर जेम्स लिमिटेड” कंपनी से जुड़ा है, जिस पर 65.22 करोड़ रुपये की बकाया राशि थी। यह कंपनी मेहता परिवार से संबंधित है। बैंक ने जब इस रकम की वसूली के लिए कार्रवाई शुरू की, तब Lilavati Kirtilal Mehta Medical Trust की ओर से प्रशांत मेहता के माध्यम से जगदीशन के खिलाफ रिश्वतखोरी की शिकायत दर्ज कराई गई।
ट्रस्ट का आरोप था कि कर्ज वसूली प्रक्रिया के दौरान मिली एक डायरी में यह उल्लेख था कि जगदीशन को 2.05 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई। यह रकम चेतन मेहता के निर्देश पर दी गई थी। साथ ही आरोप लगाया गया कि ट्रस्ट के फंड का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ उठाया गया।

■ जगदीशन का पक्ष


जगदीशन ने हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा था कि यह मामला ट्रस्ट से जुड़े परिवार के खिलाफ बैंक द्वारा चल रही वसूली प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि संबंधित परिवार ने 65 करोड़ रुपये से अधिक की रकम अब तक नहीं चुकाई, जिसके चलते बैंक ने कानूनी कार्रवाई शुरू की थी।
हाई कोर्ट ने सभी तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि इस मामले को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और शिकायत के पीछे कोई ठोस आधार या उचित मंशा नहीं है।

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