वैश्विक राजनीति के असंतुलित प्रवाह में लड़खड़ाता संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO)।

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डॉ रवि रमेशचंद्र (एसोसिएट प्रोफेसर , अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जेएनयू )/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

वैश्विक राजनीति के असंतुलित प्रवाह में लड़खड़ाता संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) डॉ रवि रमेशचंद्र, जेएनयू द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संघर्षों को रोकने और लोकतांत्रिक विकास को सशक्त करने की कवायद बिखरती नजर आ रही हैं। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से ही UNO स्वयं को परिभाषित करने के लिए बेचैन है। लेकिन महाशक्तियों की मनमानियां रोज ही गोल पोस्ट बदल देती हैं। संघर्षों को रोकने और पर्यावरण संरक्षण जैसे मोर्चे पर विफलता के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ भी लीग ऑफ नेशंस की तरह एक मूकदर्शक नौकरशाही भर रह रह गया है। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व पटल पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन एकदम से निष्क्रिय होते जा रहे हैं। जो प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता UNO ने शीत युद्ध के दौरान प्राप्त की थी, उसमें काफी गिरावट हो चुकी है।

इसके लिए UNO का वित्तीय सहायता के लिए धनि देशों पर निर्भर रहना, सांय संघर्षों को रोकने के लिए स्वयं की स्वतंत्र सैन्य शक्ति न होना, सुरक्षा परिषद् में पांच सदस्यों की तानाशाही और गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों की घनघोर उपेक्षा इत्यादि कारणीभूत हैं। अतः इसका प्रदर्शन आर्थिक विकास, लोकतान्त्रिक समाज और देश बनाने, मानवाधिकारों का संरक्षण, युद्धों को रोकने या अन्य मनमानी करने से रोकने में बेहद लचर नज़र आ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर राजनीति इस प्रकार हावी है की उन्होंने UNO जैसे संस्थाओं को दिए जाने वाले स्वैच्छिक योगदान को एक हथियार के रूप में प्रयोग करना शुरू किया है, जो की इनकी क्षमताओं को कमजोर करता जा रहा है।

उदाहरण के लिए गरीब देशों की सहायता करने वाले IMF, विश्व बैंक, WHO जैसे संस्थान भी अमेरिका और चीन जैसे देशों की साम्राज्यवादी आकांक्षा के शिकार हो रहे हैं। उनके आर्थिक और राजनितिक अजेंडे की आड़ में दुनिया के समस्त अंतराष्ट्रीय संगठनों को अपने प्रभाव में लेने को आतुर दिख रहे हैं। दूसरी ओर यह देश द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संगठन जैसे BRICS, SCO, EU में बेहतर भागीदारी और समझदारी विकसित करते दिखाई दे रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि दुनिया के बड़े देश राजनीति को अंतरराष्ट्रीय संगठनों के ऊपर रखते हैं। ये देश जब UNO के मंच पर आते हैं तो गरीब देशों और वैश्विक दक्षिण के हितों के विरोध में खुलकर आ जाते हैं। जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, महामारियों पर नियंत्रण जैसे विषय इनकी प्राथमिकता में नहीं रहे हैं। उनके व्यवहार के कारण UNO द्वारा किये जा रहे प्रयास समाधान काम, समस्या अधिक पैदा कर रहे हैं। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भंग करने या पंगु करने की राजनीतिक बहस तेज होती जा रही है। इसके परिणाम घातक हो सकते हैं।

■ उभरते अक्स, टूटती तस्वीरें

अंतरराष्ट्रीय संगठनों का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से संबंध सागर और जल जैसा है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। उनकी संरचना और संचालन तंत्र को समझना आवश्यक है। UNO जैसे संगठन में सभी प्रकार के देश शामिल हैं। अतः इसकी संरचना और संचालन तंत्र को समय के साथ बदलना और विस्तारित करना आवश्यक है। तभी यह लोकतान्त्रिक मूल्यों और समय के साथ उभरते प्रश्नों का सार्थक उत्तर दे सकेगा। इससे सदस्य देशों को अपने साथ-साथ वैश्विक हितों के साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। इसका प्रभाव टैरिफ और ट्रेड पर सामान्य समझौता (GAT), यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC), मुक्त व्यापार जैसी अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियां तभी सामान और न्यायसंगत रह पाएंगी जब, UNO जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन मजबूत बने।

समझौते को धनी और शक्तिशाली देशों के पक्ष में न रहें। जिस प्रकार हर मनुष्य को जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और गरिमा का अधिकार है, उसी प्रकार हर देश (चाहे कितना भी छोटा या गरीब हो) को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर समान भूमिका और अवसर मिलना चाहिए। UNO के नियमित फंड में अमेरिका (22 %), जर्मनी (6.11 %), चीन (12.5 %), ब्रिटेन (4.57 %), भारत (1.02) योगदान की हिस्सेदारी इसमें प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी को तय कर रही है। UNO, IMF और विश्व बैंक मे बड़ी आर्थिक शक्तियों ने अपने आर्थिक योगदान के आधार पर निर्णय प्रक्रिया को अपने राजनीतिक अजेंडे से प्रभावित करते हैं। ये सभी UNO के मंच पर इजराइल – फिलिस्तीन, ईरान – अमेरिका और यूक्रेन – रूस के बीच चल रहे युद्ध के मामले में किसी भी प्रकार से सहमत नहीं दिखते। UNO महासचिव असहाय नज़र आते हैं।

पिछले दो दशकों में शसस्त्र संघर्षों और महामारियों से होने वाली मृत्यु दर में वृद्धि हुई है। अवर वर्ल्ड इन डाटा संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक 2020 से 2024 के काल में प्रतिवर्ष औसतन 2.5 लाख लोग मारे जा रहे हैं। सिर्फ 2023-24 में यह संख्या ४ लाख से ज़्यादा हो गई है। ऐसी स्थिति में UNO की भूमिका अस्पष्ट और खोखली अपील करने वाले संगठन तक सीमित रह गई है। इसीलिए UNO समेत सभी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में संरचनात्मक और क्रियात्मक बदलाव लाने होंगे। इसके ढाँचे में सुरक्षा परिषद् का लोकतान्त्रिक स्वरुप, महासभा और उप समितियों में देशों का प्रतिनिधित्व और उनकी आवाज सुनने, विशेष समूहों जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाद्य और कृषि संगठन, अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों का राजनीतिककरण करके उसके लक्ष्य से भटकाते रहते हैं। आर्थिक ताकत के बल पर विशेषाधिकार या वीटो पॉवर जैसी व्यवस्था को समाप्त करना होगा।

वैश्विक दक्षिण की भूमिका वैश्विक दक्षिण आज एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय संकल्पना के रूप में उभर रहा है। इसलिए सुरक्षा परिषद में सुधार करते हुए इसे पांच देशों की मुट्ठी से बाहर निकालना चाहिए। 6.5 बिलियन जनसंख्या और वैश्विक जीडीपी में 40 से 42 % योगदान देने वाले वैश्विक दक्षिण को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सुधारों का आधार आर्थिक दान ही नहीं, बल्कि जीडीपी का योगदान और विश्व मानवता का कल्याण भी होना चाहिए। इस भाग में भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील वैश्विक दक्षिण की बड़ी आर्थिक और राजनीतिक शक्तियां हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में इनकी भूमिका आर्थिक योगदान के आधार पर आंकी जाती है। जबकि इन देशों को सुरक्षा परिषद समेत सभी अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व और निर्णय प्रक्रियाओं में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। आर्थिक शक्ति की धौंस जमाकर विशेषाधिकार या वीटो पॉवर जैसी व्यवस्था को समाप्त करना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय निकायों का प्रमुख उद्देश्य निरंतर संवाद और सामंजस्य कायम करना है। शुरुआत से ही यूएनओ ने इस दिशा में काफी प्रगति की है। बढ़ती संवादहीनता किन्तु पिछले तीन दशकों में यूएनओ और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों को सम्मिलित पक्षों द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है। और ये कुछ नहीं कर पाते। इससे इन संस्थाओं में देशों का विश्वास घट रहा है। इसमें सुधार की आवश्यकता है। निर्णयों को प्रभावी बनाने की निष्पक्ष और मजबूत प्रणाली लेकर ही इसे दन्तविहीन होने से बचाया जा सकता है। वैश्विक दक्षिण इस संवाद और समझ में अहम भूमिका निभा सकता है।इटली के अर्थशास्त्री एनरिको कोल्बाइटो के अनुसार, ‘अंतर्राष्ट्रीय निकाय और समझौते वास्तविक प्रभावशीलता के बजाय सुविधा और नौकरशाही से ही आकर लेती है। अंतराष्ट्रीय नौकरशाही अक्सर अपनी भूमिकाओं और विशेषाधिकारों को बनाये रखने को प्राथमिकता देते हैं और इस प्रक्रिया में अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।’ इन नौकरशाहों को अक्सर राष्ट्रीय राजनेताओं का समर्थन प्राप्त होता है, जो अंतराष्ट्रीय एजेंसियों और मंचों को अपने निजी हित, घरेलु राजनितिक लक्ष्य और चतुराई दिखाने का साधन बना लेते हैं। इसे प्रतिष्ठा और रणनीतिक हितों का मंच न बनाकर विश्व मानवता, विश्व शांति और सामूहिक आर्थिक प्रगति का मंच बनाना होगा। अतः स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां अपने उद्देश्य की पूर्ति में विफल रही हैं। उन्हें वैश्विक नीति निर्माण को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। लेकिन वे कुछ देशों की कठपुतलियाँ बनकर रह गए हैं।

सभी देशों की सम्प्रभुता और हिस्सेदारी का राजनीतिकरण किये बिना अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की प्रतिष्ठा को कायम करना होगा। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के लिए सत्ता संतुलन और कानून का राज होना ही चाहिए। क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय संगठन और विश्व राजनीति आँख और पाँव हैं। इसलिए दोनों में सामंजस्य और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। इसके माध्यम से ही हम एक सार्थक UNO की कल्पना साकार कर सकते हैं। भविष्य में संघर्षों को रोकने के लिए दुनिया को फिर से हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘योगक्षेम’ के सभ्यतामूलक विचारों का अनुकरण करना होगा।

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