मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र के गांवों में आयोजित होने वाली यात्राएं और उत्सव केवल धार्मिक या मनोरंजन के कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं, सामाजिक एकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधारस्तंभ हैं। गांवों के देवी-देवताओं, लोककलाओं, नृत्य, संगीत, परंपराओं और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से ग्रामीण समाज का सांस्कृतिक जीवन समृद्ध होता है। इन परंपराओं को संरक्षित करने के साथ-साथ गांवों का सर्वांगीण विकास और आधुनिक व्यवस्थाओं को मजबूत करना भी आवश्यक है। यह विचार महाराष्ट्र के सांस्कृतिक कार्यमंत्री एड. आशीष शेलार ने व्यक्त किए।


महाराष्ट्र शासन के सांस्कृतिक कार्य विभाग के दर्शनिका विभाग की ओर से प्रकाशित ‘राज्य गजेटियर’ के अंतर्गत ‘यात्राएं और उत्सव : कोंकण विभाग’, ‘यात्राएं और उत्सव : पश्चिम महाराष्ट्र’ तथा ‘वैदिक जलविज्ञान’ नामक तीन ग्रंथों के विमोचन समारोह में शेलार संबोधित कर रहे थे। इन तीनों ग्रंथों का विमोचन उनके हाथों किया गया।


शेलार ने कहा कि गांवों में आयोजित होने वाली यात्राएं और उत्सव वहां की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। इन आयोजनों के माध्यम से पारंपरिक कलाओं, नृत्य, संगीत और ग्रामीण जनजीवन के विभिन्न पहलुओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है। यात्राओं के दौरान गांव के लोग एक साथ आते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और सामूहिक सहभागिता की भावना विकसित होती है। इन परंपराओं का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और अध्ययन किया जाए, तो महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को अधिक प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि यात्राओं और उत्सवों का महत्व केवल धार्मिक आस्था और परंपराओं तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से स्थानीय कलाकारों, कारीगरों, छोटे व्यापारियों और विभिन्न सेवाएं उपलब्ध कराने वाले लोगों को रोजगार के अवसर मिलते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। स्थानीय कलाओं और हस्तनिर्मित वस्तुओं को प्रोत्साहन देकर इन परंपराओं का संरक्षण करना समय की आवश्यकता है।
महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में मनाई जाने वाली यात्राओं, उत्सवों और सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी संकलित करने वाले ये ग्रंथ शोधकर्ताओं, अध्ययनकर्ताओं, विद्यार्थियों और सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों के लिए उपयोगी साबित होंगे। राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि का दस्तावेजीकरण कर उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में इन पुस्तकों का प्रकाशन महत्वपूर्ण कदम है।
इस अवसर पर दर्शनिका विभाग की कार्यकारी संपादक एवं सचिव डॉ. सायली पिंपळे, शोध लेखिका डॉ. अनिता राणे, डॉ. सुवर्णा चवरे, डॉ. बलसेकर, डॉ. प्राची मोघे तथा महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी के सचिव सचिन निंबाळकर सहित संबंधित अधिकारी, शोधकर्ता, अध्ययनकर्ता और आमंत्रित अतिथि उपस्थित थे।


