शंभूनाथ शुक्ल…
कोई 32 वर्ष पहले एक बार मैं शिवरात्रि के अवसर पर हरिद्वार गया. उन दिनों कुंभ चल रहा था, इसलिए भीड़ से बचने के लिए मैं चीला स्थित फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में रुका. वहां से कुछ दूर काली मंदिर से नीचे एक शिव मंदिर था. वह मंदिर कोई भव्य अथवा विशाल नहीं बल्कि एक छोटी-सी मठिया जैसी थी. शाम से वहां कई नागा साधु जुटने लगे. सारी रात का जागरण था और ठंड भी मजे की पड़ रही थी, ऊपर से जंगल की वीरानगी. साधुओं ने चिलम निकाली और उसमें गांजा भरी फिर शुरू हो गए. मुझसे बोले- लो बच्चा प्रसाद. मेरे तो होश उड़ गये. मैं किसी तरह पिंड छुड़ा कर भाग निकला. बाद में मुझे बताया गया कि हरिद्वार के इस जंगली इलाके में कई मठिया ऐसी मिल जाएंगी जहां बाबा लोग चिलम लगा कर धुत रहते हैं. लाल आंखें और उनकी अंट-शंट बोली किसी को भयभीत कर सकती है.
जहां तक भांग की बात है, सारे शिव मंदिरों में भांग अर्पित की ही जाती है. शिवरात्रि पर अधिकतर गृहस्थ भी भांग का सेवन बुरा नहीं समझते. यहां तक कि परिवार की महिलाएं भी भांग लेती हैं.दिल्ली में प्रगति मैदान के सामने स्थित भैरव मंदिर में न सिर्फ शराब प्रतिमा को अर्पित की जाती है, बल्कि प्रसाद के रूप में भक्तों को भी मिलती है. इसे न ग्रहण करना उचित नहीं समझा जाता. इसी तरह उज्जैन समेत देश के विभिन्न इलाको में स्थित भैरो मंदिरों में भी शराब का भोग लगता है.
कोलकाता में काली देवी के मंदिर में भैंसा भी कटता था. आज हालांकि भैंसा तो नहीं कटता लेकिन बकरों की बलि खूब दी जाती है. गुवाहाटी के कामाख्या देवी मंदिर में रोजाना पचासों बकरे बलि चढ़ते हैं. पश्चिम बंगाल में शांति निकेतन (विश्व भारती) के पास रामपुरहाट के तारापीठ मंदिर में शराब आज भी चढ़ाई जाती है. यह बात दीगर है, कि बंगाली लोगों की आस्था मातृका पूजन में है. और तारा मातृका पूजन में विशिष्ट स्थान रखती हैं. देश में गंगा-यमुना के मैदान, गुजरात, राजस्थान को छोड़ दिया जाए तो वैष्णव परंपरा में शाकाहार तथा शराब, भांग, गांजा एवं बलि निषेध की दृढ़ता नहीं दिखती. शायद इसकी एक वजह यह भी है, कि इन क्षेत्रों में बौद्ध और जैन दर्शन का बहुत अधिक असर रहा है और संगम काल में वह सब वैष्णव परंपरा में समाहित हो गया.
हिंदू या सनातन धर्म का पहला स्वरूप वेद हैं. इसके बाद ब्राह्मण और उपनिषद आए. मूल रूप से वेदों के माध्यम से ही हमें संस्कारों, रीति-रिवाजों, और उनके पालन की जानकारी मिलती है. वेदों को भारतीय दर्शन और विज्ञान का स्रोत माना जाता है. चार वेद है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद. इसके बाद कर्मकांडों की जानकारी ब्राह्मणों से मिलती है. इनमें शब्दों के उत्पत्ति की कथाएं हैं. पौराणिक राजाओं और ऋषियों की गाथाएं हैं. हर वेद के अपने ब्राह्मण होते हैं. जैसे, ऋग्वेद के लिए ऐतरेय और कौषीतकी ब्राह्मण, यजुर्वेद के लिए तैत्तिरीय और शतपथ ब्राह्मण, सामवेद के लिए षडविंश ब्राह्मण और अथर्ववेद के लिए गोपथ ब्राह्मण. इसके बाद है आरण्यक, जिनमें कर्मकांड को अध्यात्म से जोड़ा गया है.
इन्हीं का अगला चिंतन है उपनिषद. इनमें उन प्रश्नों का उत्तर तलाशने की गई है, जो गूढ़ हैं. उपनिषद भारतीय अध्यात्म-शास्त्र के अहम हिस्से हैं. उपनिषदों का मुख्य विषय ब्रह्म-विद्या का प्रतिपादन है. वैदिक साहित्य में उपनिषदों का स्थान सबसे आखिर में होता है, इसलिए इन्हें ‘वेदान्त’ भी कहा जाता है. लेकिन उपनिषदों को ज़रिया बना कर वह चिंतन भी शुरू होता है, जो पहले से आ रहे चिंतन से भिन्न है. उपनिषद के माध्यम से लोग धर्म की जकड़न से स्वतंत्र हुए. भारत में दास प्रथा के नष्ट होने की शुरुआत यहां से हुई. उपनिषदों ने बताया कि आत्मा सबकी समान है और वह शरीर में रहते हुए भी शरीर से अलग है. शरीर कष्ट सहता है, आत्मा नहीं. आत्मा से समानता का चिंतन आया और इस तरह स्वतंत्रता का.
देवताओं के लिए ‘सुर’ शब्द उन के सुरापान करने के कारण ही अस्तित्व में आया. आप्टे ने अपने कोश में ‘सुर’ शब्द का अर्थ बताया है. सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्यभिविश्रुता:. यानी सुरा ग्रहण करते रहने के कारण देवता ‘सुर’ नाम से प्रसिद्ध हुए. यजुर्वेद के एक मन्त्र में सुराकार अर्थात सुरा बनाने वाले की ओर संकेत किया गया है कीलालाय सुराकारम्. इस मन्त्र के मुताबिक़ सुरा बनाने वाला सुराकार है. यजुर्वेद के दूसरे मंत्रो में सुरा बनाने की प्रक्रिया का भी वर्णन किया गया है. बौधायन ग्रन्थ में सुरा के अलावा मदिरा के रूप में वारुणी और शीघ्र का भी वर्णन है. कौटिल्य ने बेदक, प्रसन्ना, आसव, अरिष्ठ, मरैय व मधु के अलावा कापिशायन और हारहूरक जैसी शराब का उल्लेख किया है.
रामायण में भी मैरेय, सुरा और वारुणी का जिक्र है. चरक ने सुरा, मदिरा, अरिष्ट, शार्कर, गौड़, मद्य, मधु आदि को मद्यपेय माना है. सुश्रुत सूत्र में सामान्य सुरा, श्वेतसुरा यवसुरा, शीधु, नरैया और आसव का वर्णन है. बाणभट्ट ने सुरा वारुणी, अरिष्ट, मार्दीक, खर्जूर, शर्करा, शीधु, आसव, मध्वासव आदि मद्य के प्रकार बताए हैं. कालिदास ने नारिकेलासव, शीधु, पुष्पासव, मधु, द्राक्षासव, वारुणी व हाला का शराब के तौर पर उल्लेख किया है.
गौतम (2.25), आपस्तम्ब धर्मसूत्र (1.5.17.21), मनु (11.14) ने एक स्वर से ब्राह्मणों के लिए सभी अवस्थाओं में सभी प्रकार की नशीली वस्तुओं को वर्जित जाना है. सुरा या मद्यपान को महापातक कहा गया है (आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.7.21.8, वसिष्ठ धर्मसूत्र 1.20, विष्णु धर्मसूत्र 15.1, मनु 11.54, याज्ञवल्क्य 3.227). यह सब होते हुए भी बौधायन धर्मसूत्र (1.2.4) ने लिखा है कि उत्तर के ब्राह्मणों के व्यवहार में लायी जाने वाली विचित्र पांच वस्तुओं में सीधु (आसब) भी है. इस धर्मसूत्र ने उन सभी विलक्षण पांचों वस्तुओं की भर्त्सना की गई है. महाभारत (उद्योगपर्व 55.5) में वासुदेव एवं अर्जुन मदिरा (सुरा) पीकर मत्त हुए कह गए. यह मदिरा मधु से बनी थी. तन्त्रवार्तिक (पृ. 209-210) ने लिखा है कि क्षत्रियों को यह वर्जित नहीं थी अत: वासुदेव एवं अर्जुन क्षत्रिय होने के नाते पापी नहीं हुए.
महाभारत (आदिपर्व 76.77) में शुक्र, उनकी पुत्री देवयानी और शिष्य कच की कहानी कही गई है. इसके मुताबिक शुक्र ने सबसे पहले ब्राह्मणों के लिए सुरापान वर्जित माना. इसके अनुसार सुरापान करने वाला ब्राह्मण ब्रह्महत्या का अपराधी माना जायेगा. मौशलपर्व (1.29-30) में आया है कि बलराम ने उस दिन से जबकि यादवों के सर्वनाश के लिए मूसल उत्पन्न किया गया, सुरापान वर्जित कर दिया. इसे न मानने वालों को सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया.
लेकिन जैसे-जैसे वैष्णव धर्म फैला, सुरापान वर्जित होता गया. यहां तक कि मंदिरों में शराब चढ़ाना बंद कर दिया गया. पुरोहित वर्ग इससे दूर होता गया. परंतु सोमरस का वेदों में वर्णन देख कर उन्होंने भांग पीना शुरू कर दिया. किंतु शैवों और देवी मंदिरों में यह प्रतिबंधित नहीं हुआ. फिर जैसे-जैसे तंत्र साधना शुरू हुई, तो उनके मंदिरों और मठों में शराब और मांस का चलन शुरू हुआ. वाराणसी शैवों का केंद्र रहा है, एक तरफ़ वहां विश्वनाथ मंदिर है, जिसमें पूजा-पद्धति सनातनी वैष्णव परंपरा से है. दूसरी तरफ वहां औघड़ मंदिर भी हैं, जहां तंत्र साधना है. दसवीं शताब्दी के आसपास अघोरी, कालमुख और वामाचार साधना मान्य थी. वाम मार्गी साधना में पंच मकार का माहात्म्य है. अर्थात् मत्स्य, मदिरा, मैथुन, मांस और मुद्रा. कहा जाता है, यह पूजा तत्काल फल देती है.


