श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

अदालत ने बुधवार को कहा कि भारत में वाहन चालकों और पैदल यात्रियों—दोनों को ट्रैफिक नियमों का पालन करने के मामले में विकसित देशों से सीख लेनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि लोग बिना किसी दबाव के अपने भीतर नागरिक जिम्मेदारी (civic sense) विकसित करें।
न्यायमूर्ति ने अपने आदेश में कहा कि जब भारतीय विदेश जाते हैं, तो वहां के नियमों का सख्ती से पालन करते हैं, लेकिन अपने देश में ऐसा नहीं करते। उन्होंने कहा कि भारत में नियमों का पालन न करने का कोई भी औचित्य नहीं है।


मामला क्या था?
यह मामला ठाणे के वासंती और किर्ती जोशी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। उनके परिजन सतीश जोशी 9 नवंबर 2012 को नौपाड़ा स्थित अराधना टॉकीज के पास सड़क पार करते समय एक बस की चपेट में आ गए थे। वे पार्किंसन बीमारी से पीड़ित थे और आंशिक रूप से लकवाग्रस्त थे। इस हादसे के बाद 16 मार्च 2013 को उनकी मृत्यु हो गई।
मुआवजे पर कोर्ट का फैसला
मामले में (MACT) ने 2016 में परिवार को ₹13.28 लाख का मुआवजा दिया था। परिवार ने इस राशि को बढ़ाने की मांग करते हुए हाई कोर्ट का रुख किया।
हाई कोर्ट ने मुआवजे को बढ़ाकर ₹15.15 लाख कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि दुर्घटना में मृतक और बस चालक—दोनों की आंशिक लापरवाही थी, इसलिए इस निष्कर्ष में बदलाव की जरूरत नहीं है।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
पैदल यात्रियों को संभव हो तो सिग्नल पर ही सड़क पार करनी चाहिए
बस चालक को भी अधिक सतर्क रहना चाहिए था, खासकर जब उसने एक लंगड़ाते व्यक्ति को सड़क पार करते देखा
अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—एक का पालन करते समय दूसरे की अनदेखी नहीं होनी चाहिए
अंत में कोर्ट ने उम्मीद जताई कि नागरिक ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुए बेहतर नागरिकता का परिचय देंगे।


